Sunday, November 29, 2015

60 Minutes Pedalling Can Power Your Home For 24 Hours - Exercise for You and Power for Your House



India Today upload

60 Minutes On This Bicycle Can Power Your Home For 24 Hours!

November 10, 2015 by Amanda Froelich

Would you exercise for an hour every day if the workout powered your home for twenty-four hours?

People often complain about the high costs of energy and the fact that they “never have time to workout.” This invention certainly solves both conundrums.

And, most importantly, this free power invention has the potential to lift the 1.3 billion people who presently live without electricity out of poverty.

As Manoj Bhargava, the founder of the Free Electric hybrid bike, shares in the video above, it is possible to generate electricity at home while simply doing a daily workout routine.

When an individual pedals the bike, the action drives a flywheel, which turns a generator and charges a battery. This means from just one hour of pedaling, a rural household can be supplied with energy for 24 hours.

The billionaire and his team developed the bicycle to take advantage of mechanical energy created by humans to solve one of the world’s most pervasive problems.

“Everything requires energy. Energy is the great equaliser,” says Bhargava, adding that over half of the world’s population have no access to electricity or access to electricity for two or three hours per day.

Having access to clean, free energy will enable poverty-stricken communities to not only light their homes but to connect to the internet and get educated. Bhargava says the reason the majority of those who are poor stay poor is because they have no power. He aims to fix this with the free energy bicycle.

One bicycle could potentially provide a small village with electricity if each household spends on hour per day pedaling the bike.

In developed nations, the bike could also be utilized to cut energy costs and remedy the obesity crisis.

The bicycle is also a clean way to generate power. As Bhargava says himself, if half of the world uses a Free Electric bike, half of the world would be using eco-friendly energy.

Manoj’s plan is to distribute 10,000 of the bicycles in India next year. In addition, he has pledged 90% of his wealth to charity and research.

What are your thoughts on this amazing invention? Comment below and share this good news!

This article (60 Minutes On This Bicycle Can Power Your Home For 24 Hours!) is free and open source. You have permission to republish this article under a Creative Commons license with attribution to the author and

Article published under creative commons license

Tuesday, November 17, 2015

Balasaheb Thackeray - Marathi Papers and Videos - बाळासाहेब ठाकरे

बाळासाहेब ठाकरे
26 January 1926 - 17 November 2012

बाळासाहेब ठाकरे यांची  मुलाखत   Part 1


 बाळासाहेब ठाकरे यांची  मुलाखत   Part 2


Part 3

IBN Lokmat

Part 4
















बाळासाहेब ठाकरे - आखरी दर्शन शिवाजी पार्क 
सीधा प्रसारण 

17 November 2012

ईश्‍वरी अवताराचे स्वर्गारोहण

बाळासाहेब ठाकरे नावाचे वादळ शांत झाले!


महाराष्ट्र बाळासाहेबांचे चिरंतन स्मरण करील

ठाकरे नावाची दंतकथा

महाराष्ट्राचा कुटुंबप्रमुख हरपला

बाळासाहेब ठाकरे दशहरा भाषण 2012


Upload by ABMajha

Wikipedia page

बाळासाहेब ठाकरे जीवन गोष्टी 

बाळासाहेब ठाकरे : अल्पचरित्र

बाळासाहेब ठाकरे माझे आदर्श आहेत, कारण...

 हिंदुहृदयसम्राट बाळासाहेब ठाकरे यांचे मराठी माणसाच्या हृदयातील स्थान यापुढेही अढळ राहणार आहे

२३ जानेवारी, इ.स. १९२७ मध्ये  पुणे येथे बाळासाहेब ठाकरे यांचा जन्म झाला.



Saturday, November 14, 2015

Make in India - Man of India - Poem

Make in India
Man of  India
Have an Idea
Share in Media

Time is right
You are bright
You don't have to fight
States are making it light

World is confident
You don't have to be diffident
Make your skill evident
Results will be excellent

Make a car or chocolate bar
Make a door or mine iron ore
Make a drug or woolen rug
Make it better, make India wealthier.

Narayana Rao K.V.S.S.
13 November 2015

Prime Minister Narendra Modi said in his speech in Wembley that world is confident that India growing fast and it is dealing with India on an equality basis.

PM Narendra Modi's Wembley Stadium Address 13 November 2015

Times Now upload

PM Narendra Modi in UK 2015 - Address to British Parliament - Wembley Stadium Address

Importants Point made by PM on India's Development

विश्‍व आज भारत को एक शक्ति के रूप में पहचान रहा है, विश्‍व आज भारत को एक संभावनाओं की भूमि के रूप में देख रहा है और हमारी भी कोशिश है कि भारत का स्‍थान अब दुनिया में ओरों के साथ बराबरी का होना चाहिए और हम दुनिया से अब मेहरबानी नहीं चाहते, अगर हम चाहते हैं तो बराबरी चाहते हैं बराबरी। और मैं 18 महीनों के अनुभव से कह सकता हूं कि आज भारत के साथ जो भी बात करता है वो बराबरी से बात करता है। जुड़ना चाहता है तो win-win के फार्मूला के साथ जुड़ना चाहता है। आगे बढ़ना चाहता है तो कदम से कदम मिला करके आगे बढ़ना चाहता है। और ये आने वाले उत्‍तम भविष्‍य के शुभ संकेत के रूप में मैं देखता हूं।

आज दुनिया में कोई भी Institution होगी। चाहे World Bank हो, IMF हो, दुनिया की कोई भी Rating agency हो। हर कोई एक स्‍वर से कहता है कि भारत विश्‍व के बड़े देशों की, सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली Economy है। बहुत तेज गति से बढ़ने वाली Economy है।

मेरा कहने का तात्‍पर्य है हमें आधुनिक भारत बनाना है। Clean India हो, Skill India हो, Digital India हो, इन सब एक क्षेत्रों में हम कार्यों को नई ऊचांइयों पर ले जाने की दिशा में एक भरपूर प्रयास कर रहे हैं।

भाईयों-बहनों ऐसे कोटि-कोटि जनों की तपस्‍या, ऐसे कोटि-कोटि जनों का सामर्थ्‍य य‍हीं तो हैं जिसके भरोसे मैं कहता हूं हिन्‍दुस्‍तान बहुत आगे बढ़ने वाला है। हिन्‍दुस्‍तान दुनिया में विकास की नई ऊंचाईयों को पार करने वाला है।

 उस हमारी भारत मां के लिए, हम भी कोई संकल्‍प करें, हम भी भारत मां के जीवन के साथ जुड़ने का प्रयास करें, अपनी शक्ति, समय कभी न कभी मां भारती के लिए लगाने के लिए कभी न कभी सोचे। देश आपका इंतजार कर रहा है दोस्‍तों, देश आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

भारत आपको विश्‍वास दिलाता है कि आपके पास जो सामर्थ्‍य है उसमें खाद डालने का काम करने की ताकत भारत के गरीब से गरीब व्‍यक्ति में भी है। जो आपके सपनों को वटवृक्ष बना सकता है। आपके सपनों को पूरा करने के लिए उर्वरा धरती दे सकता है और उसके लिए मैं विश्‍वभर में फैले मेरे भारतीय भाईयो-बहनों को आग्रह से कहता हूं कि आइएं। देश आगे बढ़ रहा है, हम भी साथ-साथ चल पड़े, हम भी आगे बढ़े।

PM Narendra Modi's Wembley Stadium Address 13 November 2015


Times Now upload

Text of PM’s address at Community Reception at Wembley Stadium, London

नमस्‍ते, साल मुबारक, भाई दूज की बहुत-बहुत शुभकामनाएं,

Good evening Wembley a big thank you. Big thank you for being here. This is a historic day for a great partnership and you are the heartbeat between two great nations’, two vibrant democracies, two wonderful people, we are celebrating this very special relationship in this very special venue with friends of India specially Excellency Prime Minister Cameron. I was told that London would be cold but not this much. Your wonderful and warm welcome make me feel at home. I am grateful to Prime Minister Cameron for his kind words and thanks every body

मै करीब 12 साल के बाद आज आपके बीच आया हूं। 12 साल में wells में बहुत पानी बह चुका है। तब मैं जब आया था तो मुख्‍यमंत्री के रूप में आपसे मिला था और आज जब आपके बीच में आया हूं तो देशवासियों ने मुझे एक नई जिम्‍मेवारी दी है और उस नई जिम्‍मेवारी को पूरा करने के लिए भरपूर कोशिश कर रहा हूं और मेरे प्‍यारे देशवासियों में आपको विश्‍वास दिलाता हूं जो सपने आपने देखे हैं, जो सपने हर हिन्‍दुस्‍तानी ने देखे हैं, वे सपने पूरे करने का सामर्थ्‍य भारत में है, ये मैं भलीभांति अनुभव कर रहा हूं।

पिछले 18 महीने के अनुभव से मैं कह सकता हूं कि भारत को गरीब रहने का कोई कारण नहीं है। हमें बिना कारण गरीबी को पाल करके रखा है। और पता नहीं क्‍यों, आदतन हमें गरीबी को पुचकारने में जरा मजा आने लग गया है। भारत सामर्थ्‍यवान है, सवा सौ करोड़ देशवासी, 250 करोड़ भुजाएं, और वो देश जिसमें eight hundred million, 65 प्रतिशत जनसंख्‍या, 35 साल से कम उम्र की हो, भारत जवानी से लबालब भरा हुआ देश है और जिस देश के पास इतने युवा हों, वो देश अब पीछे नहीं रह सकता और वो देश विकास की इस यात्रा में अब रुक नहीं सकता है।

मैं दो दिन से यहां हूं, UK की सरकार ने, प्रधानमंत्री कैमरन ने जिस गर्मजोशी से स्‍वागत किया, सम्‍मान किया, उनके लिए मैं हृदय से उनका बहुत-बहुत आभारी हूं। लेकिन ये सम्‍मान किसी एक व्‍यक्ति का नहीं है, ये सम्‍मान सवा सौ करोड़ हिंदुस्‍तानियों का है। भारत की महान लोकतांत्रिक परंपराओं का है। प्रधानमंत्री कैमरन के साथ इसके पूर्व भी मुझे अनेक बार मिलने का, बातचीत करने का अवसर मिला है और मैंने अनुभव किया है, उनसे जब भी मिलना हुआ, वो ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए इतनी तारीफ करते हैं, इतनी तारीफ करते हैं, इतना गौरवगान करते हैं, ऐसा लगता है जैसे वो यहां के भारतीय समुदाय के साथ पूरी तरह घुल-मिल गए हैं। भारतीय समुदाय के प्रति उनकी संवेदना साफ-साफ नजर आती है। मैं उनके भारतीयों के प्रति जो प्रेम है इसके लिए उनका अभिनंदन करता हूं, उनका धन्‍यवाद करता हूं और आप लोगों का उनके साथ जो नाता है और आपके माध्‍यम से उन्‍होंने भारत को जिस रूप से जाना है और उसके कारण भारत के प्रति भी उनके मन में वो ही आदर, वो ही लगाव हर बात में महसूस होता है। और कौन भारतीय होगा, जिसको इस बात का गर्व न हो कि आज ब्रिटिश पार्लियामेंट के सामने महात्‍मा गांधी खड़े हों, इससे बड़ा गर्व क्‍या होगा? ये लंदन की धरती, आजादी का जंग इस धरती पर भी भारतीय लोगों ने आ करके आजादी के जंग की लड़ाई को ताकत दी थी। उसमें एक थे श्‍यामजी कृष्‍ण वर्मा। 1930 में उनका स्‍वर्गवास हो गया। विद्वान थे, बैरिस्‍टर थे और यहां रह करके वे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ते थे, भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ते थे और उसके लिए यहां के Bar association ने उनको निकाल दिया था। वकालत करने की उनकी सनक को रद्द कर दिया गया था। आज मैं प्रधानमंत्री कैमरन का आभारी हूं कि करीब-करीब सौ साल के बाद उन्‍होंने घड़ी की सुई का उल्‍टा कर दिया। और कल मुझे श्‍यामजी कृष्‍ण वर्मा को, जो अब तो रहे नहीं लेकिन उनके सम्‍मान में, उनको फिर से बार की membership को continue करने वाला कागज मुझे सौंपा।

जब मैं गुजरात में था, 2003 में मैं यहां आया था। मैं यहां से जिनेवा पंडित श्‍यामजी वर्मा की अस्थि लेने के लिए जाने वाला था, श्‍यामजी कृष्‍ण वर्मा लंदन की धरती पर रह करके आजादी का जंग लड़ रहे थे। वीर सावरकर जैसे अनेक महापुरुषों को, मदनलाल ढींगरा जैसे तेजस्‍वी, ओजस्‍वी नौजवानों को वे यहां प्रोत्‍साहित करते थे। 1930 में उनका स्‍वर्गवास हुआ तो उनकी इच्‍छा व्‍यक्‍त की थी कि उनके स्‍वर्गवास के बाद उनकी अस्थि हिन्‍दुस्‍तान आजाद जब हो, तो आजाद हिन्‍दुस्‍तान में ले जाई जाएं। लेकिन 1930 से 2003 तक भारत से कोई आया नहीं वो अस्थि लेने के लिए। भारत मां के उस लाल की अस्थि ले जाने का सद्भाग्‍य मुझे मिला और 2003 में मैं ले गया। और गुजरात में कच्‍छ मांडवी, जो उनका जन्‍म स्‍थान था वहां एक भव्‍य स्‍मारक बनाया है, उनके स्‍मृति चिह्न अस्थि वहां रखे हैं। आज मुझे यहां के bar का जो स्‍वीकृति पत्र फिर से मिला है, वो भी मैं गुजरात सरकार को सुपुर्द करूंगा और वो भी उस Museum में रखा जाएगा। और इसलिए मैं कहता हूं कि प्रधानमंत्री कैमरन ने घड़ी की सुई को उल्‍टा घुमाया है। मैं उनका आभारी हूं।

भारत जिस विकास यात्रा की ओर आगे बढ़ रहा है, हमारा देश दुनिया के लिए एक अजूबा है। प्रधानमंत्री बनने के बाद विश्‍व के जिन-जिन लोगों से मेरा मिलना हुआ है, एक बात अवश्‍य पूछते हैं, क्‍योंकि हर देश किसी न किसी समस्‍या से जूझ रहा है और इसलिए वे कभी-कभी मुझे पूछते हैं कि मोदी जी हमारा इतना छोटा देश, ये परेशानी, वो परेशानी; ये तकलीफ वो तकलीफ; ये समुदाय ऐसा करता है, वो समुदाय ऐसा करता है, वो लोग ऐसा करते हैं, अक्‍सर बातें करते हैं, फिर मुझे पूछते हैं कि मोदी जी ये बताइए ये आपका सवा सौ करोड़ का देश इतने प्‍यार से, इतने मिलजुल करके कैसे रहता है? लोगों को आश्‍चर्य है ऐसा देश जहां सौ भाषाएं हों, 1500 बोलियां हों, हजारों प्रकार के खानपान की पद्धतियां हों। दक्षिण से निकलें, उत्‍तर पहुंचते-पहुंचते सैंकड़ों प्रकार की वेशभूषा नजर आती हो, कितनी विविधताओं से भरा हुआ हमारा देश है और विविधता, ये हमारी विशेषता भी है; विविधता, ये हमारी आन, बान, शान भी है; विविधता, ये हमारी शक्ति भी है।

अब आप देखिए पंजाब के हमारे सिख भाई, कितनी त्‍याग और बलिदान की गाथाएं जुड़ी हुई हैं। भारत की आन, बान, शान के लिए कितने सिखों ने अपने सिर न्‍यौच्‍छावर कर दिए थे और सिख समाज की एक विशेषता रही है कि वे मां भारती की भी रक्षा करते रहे। मां भारती की रक्षा के लिए अपना खून बहाते रहे और आजाद हिंदुस्‍तान में भारत माता की संतानों का पेट भरने के लिए वे खेतों में अपना पसीना बहाते रहे और हिंदुस्‍तान भर का पेट भरने के लिए उन्‍होंने कभी कमी नहीं रखी।

मैं जब कल यहां आया, यहां के सिख समाज के सभी वरिष्‍ठ लोग मुझे मिलने आए थे। बहुत प्‍यार से बातें हुईं। हम दोनों ने मिल करके अपने दुखों को, अपने दर्दों को बांटा। उनके दिल पर जो गुजरती हैं बातें, उनकी भावनाओं का मैं आदर करता हूं, उनकी कठिनाई को मैं समझता हूं। और मैंने विश्‍वास दिलाया है कि जिन-जिन बातों को आप कर रहे हैं, मैं पूरी तरह उन चीजों में लगा हुआ हूं। आने वाले भविष्‍य में आपको उसके नतीजे भी नजर आ जाएंगे।

भारत की धरती पर कबीर और रहीम की बातें हम सबको प्रेरणा देती रही हैं। सूफी परंपरा, आज विश्‍व में जो आतंकवाद के नाम पर जो चीजें चल रही हैं, कभी मुझे लगता है अगर सूफी परंपरा बलवान हुई होती, इस्‍लाम में ही इस सूफी परंपरा का अगर प्रभाव पड़ा होता और जिसने सूफी परंपरा को समझा होता, वो कभी हाथ में बंदूक लेने का विचार नहीं करता। ऐसी विविधताओं से भरी दुनिया के सभी प्रमुख सम्‍प्रदाय हिंदुस्‍तान की धरती पर हैं। और सिर्फ कहने को नहीं, भारी मात्रा में समुदाय हैं। हमारे यहां ऋतुएं कितनी हैं, हमारे यहां विविधताएं कितनी हैं, हमारे यहां पेड-पौधे देखें, ये देश विविधताओं से, परमात्‍मा की कृपा से पुलकित हुआ है और आप उस देश के एक प्रकार से सच्‍चे Ambassador हैं। भारतीय समुदाय का व्‍यक्ति जहां गया, वहां सबके साथ रहने का, जीने के संस्‍कार ले करके गया। विविधताओं के बीच में भी सबके साथ कैसे जीया जाता है, अपनी पंरपराओं को बचाते हुए सबके साथ कैसे घुल-मिल करके जिंदगी जी सकते हैं, अगल-बगल में किसी को खंरोच भी न आ जाए उसके बाद भी गति तेज कर सकते हैं, लक्ष्‍य को प्राप्‍त कर सकते हैं, ऊंचाईयां और बढ़ा सकते हैं, ये आपने दिखाया है। विश्‍व भर में फैले हुए भारतीय समाज ने ये संस्‍कार का परिचय करवाया है, ये शक्ति का परिचय करवाया है और उन्‍हीं के माध्‍यम से हिंदुस्‍तान की सही पहचान भी बनती है। और इसलिए विश्‍व भर में फैले हुए भारतीय समुदाय को भी इस महान परंपरा को आपके अपने व्‍यवहार से, अपने चरित्र से, अपने आचरण से दुनिया को अपने भारत की ताकत का परिचय करवाया है इसलिए आप सब मेरे भाई-बहन ह्दय के, ह्दय से अभिनंदन के अधिकारी हैं, बहुत-बहुत बधाई के अधिकारी हैं।

भाइयों-बहनों, आज विश्‍व में भारत की अपनी एक गरिमा, एक गौरव, उसका अनुभव आप भी करते होंगे। पूरी दुनिया आज भारत के प्रति बहुत आशा की नजर से देख रही है। भारत का नाम सुनते ही India सुनते ही आपको जिन-जिन विदेश में लोगों को मिलते हो, आपको भी महसूस होता है कि नहीं होता है? आपको भी ध्‍यान में आता है कि दुनिया का नजरिया बदलता है? पहले लोग मिलते हैं वे अब मिलते हैं तो बड़ी गर्मजोशी से मिलते हैं? पहले हाथ मिलाते थे अब हाथ पकड़ के रखते हैं? ये बदलाव जो है, ये बदलाव ही भारत की सफलता की एक निशानी के रूप में है।

विश्‍व आज भारत को एक शक्ति के रूप में पहचान रहा है, विश्‍व आज भारत को एक संभावनाओं की भूमि के रूप में देख रहा है और हमारी भी कोशिश है कि भारत का स्‍थान अब दुनिया में ओरों के साथ बराबरी का होना चाहिए और हम दुनिया से अब मेहरबानी नहीं चाहते, अगर हम चाहते हैं तो बराबरी चाहते हैं बराबरी। और मैं 18 महीनों के अनुभव से कह सकता हूं कि आज भारत के साथ जो भी बात करता है वो बराबरी से बात करता है। जुड़ना चाहता है तो win-win के फार्मूला के साथ जुड़ना चाहता है। आगे बढ़ना चाहता है तो कदम से कदम मिला करके आगे बढ़ना चाहता है। और ये आने वाले उत्‍तम भविष्‍य के शुभ संकेत के रूप में मैं देखता हूं।

विश्‍व जिन समस्‍याओं से जूझ रहा है उसमें दो प्रमुख समस्‍याएं हैं। सारी दुनिया के जितने भी नेता, जब भी मिलते हैं इन दो बातों से परेशानियों की चर्चा करते ही करते हैं, एक आतंकवाद, दूसरा ग्‍लोबल वार्मिग। आतंकवाद हो या ग्‍लोबल वार्मिंग हो, सारी मानव जाति को बचाने की जिम्‍मेवारी सभी देशों की है, मानवता में विश्‍वास करने वाले हर नागरिक की है और भारत इसके लिए सही रास्‍ता दिखा सकता है। महात्‍मा गांधी का जीवन, महात्‍मा गांधी के उपदेश, महात्‍मा गांधी का अहिंसा का शस्‍त्र, उसमें वो ताकत है, अगर आज के परिप्रेक्ष्‍य में विश्‍व गांधी को समझने का प्रयास करे तो आतंकवाद से मुक्ति का रास्‍ता भी मिल सकता है और ग्‍लोबल वार्मिंग से मुक्ति का भी रास्‍ता मिल सकता है क्‍योंकि गांधी इतने दीर्घ दृष्‍टा थे। और इसलिए भारत की वो भी जिम्‍मेवारी है कैसे संकट की घड़ी में मानवता के कल्‍याण के लिए विश्‍व को इन समस्‍याओं से बाहर निकलने के लिए भारत अपनी भूमिका निभा रहा है और आगे भी निभाता रहेगा, ये मैं आप मेरे देशवासियों को विश्‍वास दिलाता हूं।

देश आज विकास की नई ऊंचाईयों की ओर तेज गति से चल रहा है और मैं विश्‍वास से कहता हूं कि भारत ने जो गति पकड़ी है, भारत ने जो दिशा पकड़ी है; उस गति से, उस दिशा से बहुत ही जल्‍द हम उसके फल भी देखने शुरू करेंगे। आजादी के सत्‍तर साल के बाद आपको जान करके हैरानी होगी, आज भी हिंदुस्‍तान में 18 हजार गांव ऐसे हैं जहां बिजली का खंभा भी नहीं पहुंचा है। आप मुझे बताइए भाइयों-बहनों, क्‍या ये काम मुझे पूरा करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? उन 18 हजार गांवों में, जहां बिजली नहीं पहुंची है, वहां बिजली पहुंचनी चाहिए कि नहीं पहुंचनी चाहिए? आजादी के सत्‍तर साल के बाद भी अगर मेरा देशवासी अंधेरे में जिंदगी जीने के लिए मजबूर है तो हमें प्रायश्चित करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? भाइयों-बहनों, मैंने बीड़ा उठाया है, आप मुझे आशीर्वाद देंगे? मैंने बीड़ा उठाया है, राज्‍यों से कहा है मुझे मदद कीजिए, आने वाले एक हजार दिवस में इन 18 हजार गांवों में बिजली पहुंचाने का संकल्‍प करके चला हूं।

जब मुझे पहली बार लाल किले की प्राचीर से हिंदुस्‍तान के तिरंगे झंडे के नीचे से देश को संबोधित करने का पहला अवसर मिला; बचपन में जिंदगी में कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन एक चाय बेचने वाला, गरीब परिवार का बेटा, लाल किले की प्राचीर से हिंदुस्‍तान का तिरंगा झंडा फहराता होगा। और उस दिन मैंने कहा था, स्‍वच्‍छ भारत का सपना मैंने देशवासियों के सामने रखा था। बहुतों को आश्‍चर्य हुआ था कि लाल किले पर से तो कितनी बड़ी-बड़ी बातें करनी चाहिए, कितनी बड़ी-बड़ी योजनाएं रखनी चाहिए, अखबारों में headline छप जाएं ऐसी चीजें बतानी चाहिए और ये मोदी कहां से आ गया, ये सफाई की बातें करने के लिए लाल किले का उपयोग कर रहा है। बहुतों को बुरा लगा था, लेकिन मुझे, मुझे अच्‍छा लगा था मेरा देश अगर साफ-सुथरा हो, गंदगी से मुक्‍त मेरी भारत माता हो, आपको आनंद होगा कि नहीं होगा? गरीब की जिंदगी में बदलाव आएगा कि नहीं आएगा? उस काम को मैंने शुरू किया है, उसमें पहला काम उठाया Toilet बनाने का और मैं, मैं ये विदेश में रहने वाले मेरे भारतीय भाइयों-बहनों का भी आभार व्‍यक्‍त करता हूं कि कई भारतीय भाई-बहन जो विदेश में रहते हैं, उन्‍होंने भी अपने गांवों में public toilet बनाने के लिए पैसे दिए, बनवाए।

हमारे यहां बालिकाएं 3 साल, 5 साल, 6 साल, 8 साल; दूसरी या तीसरी कक्षा में आती हैं तो स्‍कूल जाना छोड़ देती हैं। पता चला कारण क्‍या तो बच्चियों के लिए स्‍कूल में अलग toilet नहीं था। क्‍या 21वीं सदी में हमारी बेटियां अनपढ़ रहें, ये हमें मंजूर है क्‍या? क्‍या उनके साथ ये अन्‍याय है कि नहीं है? और इसलिए मैंने एक बीड़ा उठाया, एक निश्चित समय-सीमा में भारत के सभी स्‍कूलों में girls child के लिए अलग toilet बनना चाहिए और आज मैं खुशी से कह सकता हूं कि सबने मिल करके उस काम को पूरा कर दिया। क्‍या ये काम नहीं होने चाहिए थे क्‍या? पहले होने चाहिए थे कि नहीं होने चाहिए थे?

भाइयों-बहनों, हमारे देश में 40 प्रतिशत लोग ऐसे थे जिनका बैंक में account भी नहीं था। आज के युग में अगर बैंक खाते में कोई गरीब को बैंक के दरवाजे तक जाने की स्थिति न हो तो इससे बड़ी शर्मिंदगी क्‍या हो सकती है और इसलिए एक अभियान चलाया, सौ-डेढ़ सौ दिन के अंदर 19 करोड़ नए बैंक के खाते खुल गए। अगर हम व्‍यवस्‍थाएं बदलना चाहते हैं तो देश तैयार है, देश ने अपना मन बना लिया है और उसके कारण बदलाव नजर आने लगा है।

भाइयों-बहनों, भारत अपनी पुरानी समस्‍याओं से मुक्‍त हो ये तो जरूरी है लेकिन क्‍या मुसीबतों से मुक्ति पा करके बैठे रहने से चलेगा क्‍या? भारत को अपनी कठिनाइयों से तो मुक्ति लेनी है लेकिन भारत को आधुनिक भारत भी बनाना है, समृद्ध भारत भी बनाना है, विकास की नई ऊंचाइयों को भी पार करना है।

हमारे यहां रेलवे, रेलवे बहुत पुरानी हमारे यहां व्‍यवस्‍था है लेकिन जिस गति से रेलवे का विकास होना चाहिए, दूर-सुदूर क्षेत्रों में जहां रेल पहुंची नहीं वहां पहुंचाना चाहिए। बाबा आदम के जमाने से जिस गति से रेल चलती थी वो वक्‍त चला गया, अब तेज गति से चलने वाली रेल चाहिए। अच्‍छी सुविधा वाली रेल चाहिए और इसलिए हमने रेलवे में hundred percent foreign direct investment के लिए हमने दरवाजे खोल दिए हैं।

पहली बार, पहली बार London stock exchange में भारत की रेलवे Rupees bond ले करके आई है दोस्‍तों rupees bond। ये पहली बार हुआ है और हम तो जब bond की बात आती है तो सबसे पहले James bond की याद आती है। मनोरंजन की दुनिया मनोरंजन की दुनिया, entertainment के लिए James bond हम भली भांति परिचित हैं, उससे आगे जाएं तो जब bond की बात आती है तो brook bond tea की याद आती है। अगर James bond मनोरंजन देता है तो brook bond ताजगी देता है। Brook bond, tea bond, that’s bond लेकिन अब, अब न मनोरंजन से चलना है न सर्फ ताजगी से चलना है, अब तो विकास की राह पर जाना है और इसलिए James bond, Brook bond, Rupee bond, foreign direct investment में FDI और जब में FDI की बात करता हूं तो उसका एक महत्‍वपूर्ण पहलू तो है foreign direct investment लेकिन मेरे लिए दूसरा भी एक महत्‍वपूर्ण पहलू है Fast Develop India और इन दोनों को balance करते हुए हम आगे बढ़ना चाहते हैं। गत वर्ष की तुलना में आज foreign direct investment में 40 प्रतिशत वृद्धि हुई है। ये अपने-आप में इस बात का सबूत है कि विश्‍व का भारत के प्रति विश्‍वास बढ़ रहा है। और भारत के प्रति जो विश्‍वास बढ़ रहा है वो ही भारत को आगे बढ़ाने की एक सबसे बड़ी हमारी ताकत है और उस ताकत को ले करके हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

Defence Sector, आज भी हमारी रक्षा के लिए हमें दुनिया की मदद पर निर्भर रहना पड़ता है, depended रहना पड़ता है, हमें शस्‍त्र बाहर से लाने पड़ते हैं, अरबों-खरबों रुपये हमारे बाहर चले जाते हैं। हमने बीड़ा उठाया है, अगर भारत के वीर भारत की रक्षा करते हैं, तो भारत के वीरों के हाथ में वो शस्‍त्र भी भारत के वीरों के हाथों से बना हुआ होना चाहिए। और इसलिए दुनिया से रक्षा के क्षेत्र में उपयोग आने वाले साधन, चाहे वो पनडुब्बियां हों, चाहे हेलीकॉप्‍टर हों, हवाई जहाज हों, टैंक हों, छोटे हथियार हों, ये भारत में निर्माण कैसे हो, उसके expertize भारत में कैसे आएं, technology हिंदुस्‍तान में कैसे आए? उस पर हम भारी मात्रा में बल दे रहे हैं और मैं आज आप को खुशखबरी सुनाता हूं, शस्‍त्रार्थ की दुनिया में जो भी बड़े-बड़े player हैं वे आज भारत के साथ बातचीत कर रहे हैं, भारत में आने के लिए दरवाजे खोज रहे हैं। और मैं विश्‍व को कहना चाहता हूं कि रक्षा के क्षेत्र में भारत आत्‍मनिर्भर बनना, मतलब विश्‍व की one-six th humanity हम दुनिया की one-sixth आबादी है। उनकी सुरक्षा मतलब विश्‍व की एक-छठवें वाली सुरक्षा की गारंटी बन जाती है। और वो अपने-आप में दुनिया को सुरक्षित रखने की एक ताकत भी देती है, एक नया विश्‍वास पैदा करती है। हम अपना तो भला करना चाहते हैं लेकिन हमारी भलाई में ओरों की भलाई भी होनी चाहिए।

मैने कहा था ग्‍लोबल वार्मिंग की चिंता। भारत ने बीड़ा उठाया है दो चीजों का। एक, हम दुनिया को सूर्यपुत्र राष्‍ट्र, वो देश जिनको सूर्य की शक्ति का अधिक लाभ मिलता है, जहां गर्मी रहती है, उजाला रहता है। पूरे विश्‍व के ऐसे देशों का हम एक संगठन करना चाहते हैं। भारत ने बीड़ा उठाया है कि दुनिया में 102 देश ऐसे हैं कि जिनको सहज रूप से सूर्य शक्ति का लाभ मिलता है वो एक प्रकार से सूर्यपुत्र राष्‍ट्र हैं। दुनिया में पेट्रोल वाले देशों का संगठन है, G-7 है, G-20 है, आसियान है, सब कुछ है, लेकिन सूर्यपुत्रों को कभी इकट्ठा किसी ने नहीं किया, हमने बीड़ा उठाया है दुनिया के सूर्यपुत्रों को इकट्ठा करने का। ये देश मिल करके Solar energy में research करें, renewable energy में research करें, सूर्य शक्ति का जीवन में कैसे सर्वाधिक उपयोग हो, प्रकृति की रक्षा हो। तो एक तो हम वैश्विक, इस व्‍यवस्‍था का नेतृत्‍व भारत करने जा रहा है और मैं देख रहा हूं, मैं पिछले कुछ दिनों से विश्‍व के नेताओं से बात कर रहा हूं, सब दूर से मुझे सकारात्‍मक समर्थन मिल रहा है और उसकी पहली प्राथमिक मीटिंग इसी महीने के अंत में हम पैरिस में करने जा रहे हैं। सभी देश के लोगों को इस एक अलग से मीटिंग करूंगा वहां मैं बुलाऊंगा उनको बात समझाने वाला हूं। भारत नेतृत्‍व कर सकता है, भारत नेतृत्‍व कर सकता है। इन बातों को करने के लिए भगवान सूर्य की हम पर कृपा है तो मैं दुनिया को भी उसमें जोड़ना चाहता हूं।

दूसरा काम, ये बात सही है कि भारत में अभी इन बातों को करने के लिए भगवान सूर्य की हम पर कृपा है। तो मैं दुनिया को भी उसमें जोड़ना चाहता हूं।

दूसरा काम, यह बात सही है कि भारत में भी हर जगह पर 24 घंटे बिजली नहीं पहुंची। 18 हजार गांव को मैंने बताया कि जहां खंभा भी नहीं है। लेकिन जहां बिजली है वहां अभी 24 घंटे नहीं है। हमने बीड़ा उठाया है, 2019, महात्‍मा गांधी के डेढ़ सौ साल हो रहे हैं। दो सपने हैं मेरे, एक सफाई का और दूसरा 24 घंटे बिजली पहुंचाने का और इसलिए हमने एक अभियान चलाया है, Solar Energy का, Wind Energy का, Renewable Energy का। Hundred Seventy five गीगावॉट Renewable Energy का काम शुरू किया है। भारत में जब भी बिजली की बात आती थी मेगावॉट की बात आती थी, मेगावॉट। मेगावॉट से ज्‍यादा हम कभी सोच ही नहीं पाते थे। पहली बार हिन्‍दुस्‍तान गीगावॉट पर सोचने लगा है। जब मैं विश्‍व के नेताओं से मिलता हूं और Hundred Seventy five गीगावॉट बिजली के लक्ष्‍य की बात करता हूं, Renewable Energy की सारे विश्‍व के नेता, उनको अचरज होता है, वह सोचते हैं आप ये कैसे सोच सकते हैं लेकिन मेरे देशवासियों आप के आशीर्वाद से मुझे पूरा भरोसा है कि भारत एक सूर्य शक्ति राष्‍ट्र बन सकता है, सूर्य शक्ति राष्‍ट्र बन सकता है। हम उसे बनाने की दिशा में और उसके बाद जो छोटे-छोटे टापू देश हैं जो जिदंगी और मौत के बिना गुजारा कर रहे हैं उनको लगता है कि Global Warming के कारण अगर समुद्र की सतह बढ़ गई, तो उनका टापू डूब जाएगा कहां जाएंगे। ऐसे सैंकड़ों टापुओं पर रहने वाले लोग, उनकी जिंदगी में खुशी लाने का काम हिन्‍दुस्‍तान की धरती पर हो सकता है और उस काम को हम कर रहे हैं दोस्‍तो।

आज दुनिया में कोई भी Institution होगी। चाहे World Bank हो, IMF हो, दुनिया की कोई भी Rating agency हो। हर कोई एक स्‍वर से कहता है कि भारत विश्‍व के बड़े देशों की, सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली Economy है। बहुत तेज गति से बढ़ने वाली Economy है।

दुनिया में एक Transparency International इस प्रकार का रेटिंग करते हैं कि वो कौन देश हैं जहां भ्रष्‍टाचार कम है और भ्रष्‍टाचार कम हो रहा है। हम जानते हैं हमारे देश में ये बदनामी हमको है हमारे सिर पर लिखी हुई है। दीमक की तरह भ्रष्‍टाचार ने हमें तबाह करके रखा हुआ है। लेकिन क्‍या दीमक की दवाई नहीं है क्‍या और दवाई होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए? जनता के पैसे का पाई-पाई का हिसाब जनता को मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए या किसी के घर भरने के लिए जनता का धन होता है क्‍या? और इसलिए भाइयों और बहनों हमने कदम उठाए हैं उसका परिणाम यह हुआ है Transparency International नाम की Institution, उसने भारत को पहले की स्थिति से दस points आगे कर करके हमारे यहां भ्रष्‍टाचार कम हुआ है, उसको सर्टिफिकेट दे दिया है। पहली बार, पहली बार हम china से अच्‍छी स्थिति में आ गये हैं जो कभी नहीं आते थे। Ease doing business में हम दुनिया के आखिरी छोर पर खड़े थे। हमने कुछ कदम उठाएं, कुछ निर्णय किए, आज हम बहुत तेजी से हमारा नंबर ऊपर की ओर जा रहा है और देखते ही देखते सुफल उसके नज़र आने लगे हैं।

मेरा कहने का तात्‍पर्य है हमें आधुनिक भारत बनाना है। Clean India हो, Skill India हो, Digital India हो, इन सब एक क्षेत्रों में हम कार्यों को नई ऊचांइयों पर ले जाने की दिशा में एक भरपूर प्रयास कर रहे हैं।

लेकिन मेरे देशवासियों हम ये गलती कभी न करें कि जो हम टीवी के पर्दे पर देखते हैं बस वही हिन्‍दुस्‍तान है ऐसा सोचने की गलती कभी न करें। अखबार की Headline में जो है उतना ही हिन्‍दुस्‍तान है ऐसा नहीं है। हिन्‍दुस्‍तान बहुत बड़ा है। टीवी के पर्दे के बाहर भी सवा सौ करोड़ देशवासियों का हिन्‍दुस्‍तान बहुत गहरा हिन्‍दुस्‍तान है, बहुत ऊंचा हिन्‍दुस्‍तान है, बहुत ही उत्‍तम हिन्‍दुस्‍तान है और इसलिए न कभी आपने पढ़ा होगा, न कभी आपने सुना होगा।

भाइयों और बहनों राजस्‍थान में अलवर करके जगह है अलवर में इमरान खान नाम का एक व्‍यक्ति है। ये इमरान खान शिक्षा के लिए समर्पित व्‍यक्ति है। अलवर जैसे छोटे स्‍थान का इमरान खान उसने मोबाइल फोन की 50 Apps बनाई और वो भी विद्यार्थियों को काम आए ऐसी शिक्षा से संबंधित उसने App बनाई और बनाई इतना ही नही अलवर के इमरान खान ने खुद ने मिलाई हुई शिक्षा में स्‍टुडेंट को काम आने वाली ये 50 App उसने विद्यार्थियों के नाम मुफ्त में समर्पित कर दी। मेरा हिन्‍दुस्‍तान, वो अलवर के इमरान खान में मेरा हिन्‍दुस्‍तान है।

भाइयों और बहनों कुछ समय पहले हरियाणा, जहां हमारे यहां बेटा और बेटी के Ratio में बहुत बड़ा अन्‍तर है। मैंने एक अभियान चलाया वहां, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ शुरूआत मैंने हरियाणा से की और उसका असर ऐसा था एक छोटे से गांव के सरपंच ने selfie with daughter ऐसा एक प्रयोग किया। मेरे ध्‍यान में आया, मैंने उसकी भी तारीफ की और मैं हैरान था कि सारी दुनिया में हर किसी के Mobile का Interest बन गया था। selfie with daughter. एक जनांदोलन खड़ा हो गया। दुनिया के बड़े-बड़े राजनेता हो, शिक्षा जगत के वरिष्‍ठ लोग हों, आर्थिक जगत के वरिष्‍ठ लोग हों, हर किसी ने अपनी बेटी के साथ selfie निकाल करके mobile phone पर circulate किया। मां-बेटियों का गौरव बढ़ाने का एक अभियान चल पड़ा। ये है मेरा हिन्‍दुस्‍तान ऐसे लाखों लोग है जो आदिवासियों के बीच जा करके, वहां की कठिनाई को भी जी करके, कोई शिक्षा में लगा है, कोई लोगों को हेल्‍थ की चिंता कर रहा है, कोई लोगों के संस्‍कार की चिंता कर रहा है। दूर-सुदूर गांवों में ऐसे अनेक तपस्‍वी लोग बैठे हैं जो जीवन में समाज सेवा का व्रत ले करके काम कर रहे है।

भाईयों-बहनों ऐसे कोटि-कोटि जनों की तपस्‍या, ऐसे कोटि-कोटि जनों का सामर्थ्‍य य‍हीं तो हैं जिसके भरोसे मैं कहता हूं हिन्‍दुस्‍तान बहुत आगे बढ़ने वाला है। हिन्‍दुस्‍तान दुनिया में विकास की नई ऊंचाईयों को पार करने वाला है।

भाईयों-बहनों मैं आज जब लंदन में आया हूं इतनी सारी मात्रा में हमारे प्रवासी भारतीय भाई-बहन बैठें हैं। मैं कुछ बातें आपको बताना चाहता हूं, OCI, OCI के कारण कुछ समस्‍याएं है ऐसा मेरी बातें मेरे ध्‍यान में आई हैं। उस प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा और OCI की समस्‍या से अब आपका मुक्ति मिल जाएगी। उसी प्रकार से OCI और PIO इसको merger कर दिया हमने, लेकिन कुछ लोगों को उसमें दिक्‍कत आ रही है। मैंने उसके लिए आदेश कर दिए है, उसको भी सरल कर दिया गया है। फिर भी आपकी कोई कठिनाईयां होगी, तो उसको address करने की व्‍यवस्‍था बन चुकी है।

Visa का Problem रहता था अब उसको Electronic Travel Authorization कर दिया गया है। उसके कारण आपको उस दिक्‍कत से भी मुक्ति दिलाई गई है। भारत सरकार ने मदद नाम का एक Online platform तैयार किया है। MADAD (मदद) उस Online platform पर जा करके आप अपनी आवश्‍यक चीजें प्राप्‍त कर सकते है। वीजा की Problem हो और कोई OCI का problem हो, PIO का Problem हो उसके लिए रास्‍ते, उसमें एक platform पर वो समस्‍या का समाधान का मार्ग आपको मिल जाए इसकी व्‍यवस्‍था की गई है।

एक E-Migration portal बनाया गया है। जिसके कारण एक स्‍थान पर से दूसरे स्‍थान पर जाने वाले व्‍यक्ति को प्राथामिक जानकारियों की जरूरत पड़ती है। ये E-Migration portal के द्वारा वो जान‍कारियां भी आपको उपलब्‍ध हो जाएंगी।

एक Indian community welfare fund, विश्‍व में रहने वाले भारतीयों को कभी-कभी संकट आ जाता है। उनको संकट से मदद करने के लिए एक Indian community welfare fund इसकी भी व्‍यवस्‍था कर दी गई है और जब मैं गुजरात में था तो लंदन से जो भी लोग मिलने आते थे मेरा गला पकड़ते थे हमारे मित्र सीबी पटेल आते थे। वो lead करते थे और मैं कहता था कि अब मैं तो गुजरात का मुख्‍यमंत्री हूं मैं क्‍या कर सकता हूं। अब मैं प्रधानमंत्री बन गया, तो ये मुझे कह रहे हैं कि मोदी जी बताओ अब तो मुख्‍यमंत्री नहीं हो, क्‍या करोगे। तो आज मैं लंदन की धरती पर आया हूं। 2003 में आया था। तब मैं एक काम यहां करके गया था। लंदन-अहमदाबाद के बीच में Direct flight तब अटल जी की सरकार थी। यहां के लोगों ने मुझे जो कहा मैंने उनको पहुंचाया और अटल जी ने उस काम कर दिया था। लेकिन बाद में क्‍या हुआ आप जानते हैं, कैसे हुआ मैं बताना नहीं चाहता, क्‍यों हुआ मुझे भी मालूम नहीं, किसने किया अब नाम देने की जरूरत क्‍या है। लेकिन मेरे प्‍यारे भाईयों-बहनों 15 दिसंबर से तो मेरे प्‍यारे देशवासियों 15 दिसंबर से लंदन-अहमदाबाद Direct flight शुरू हो जाएगी।

भाईयों-बहनों शायद दुनिया के किसी नेता को भी ऐसा सौभाग्‍य नहीं मिलता होगा। ये आपका आर्शीवाद, ये आपका प्‍यार ऐसी ठंड में भी इतनी बड़ी तादाद में आज आपने एक नया इतिहास बना दिया है।

यहां पर आपसे मेरे एक Request है जिसके पास सुई वाली घड़ी हो जरा घड़ी बाहर निकालिएं, आपकी सुई वाली घड़ी हो जरा बाहर निकालिएं। कितने बजे हैं पौने सात। मैं जरा आपको एक रहस्‍य बताना चाहता हूं। भारत और इंग्‍लैंड का नाता कितना गहरा है, भारत और इंग्‍लैंड के बीच में अपनापन कितना है, हमें भारत और इंग्‍लैंड के समय को देखने के लिए दो घड़ी रखने की जरूरत नहीं है। आप इसको उलटा कर दिजिए, आपको हिन्‍दुस्‍तान का time नजर आ जाएगा। आपकी घड़ी अगर आप सीधी करोगे तो UK का time है, उलटी करोगे इंडिया का time है। अब आपको कभी हिन्‍दुस्‍तान फोन करना हो तो हिसाब नहीं लगाना पड़ेगा कि साढ़े पांच घंटे वापिस जाएं, फिर समय तय करें। घड़ी को उलटा कर दो कि हां ठीक है भई इतना ही time हुआ होगा।

ये दुनिया के दो कोई भी देश के साथ ऐसा समीकरण नहीं है। इतना ही नहीं, इंग्‍लैंड और भारत का ये प्‍यार हमारे अड़ोस-पड़ोस में भी किसी को नहीं है। ये सौभाग्‍य, ये सौभाग्‍य सिर्फ हिन्‍दुस्तान और इंग्‍लैंड के बीच का है। भाईयों-बहनों जब तक सूरज-चांद रहेगा, जब तक समय की गति चलेगी, भारत और इंग्‍लैंड का नाता और मजबूत होता जाएगा। हम कंधे से कंधा मिला करके विकास की नई ऊचाईयों को पार करते चले जाएगें।

भाईयों-बहनों आपने मुझे बहुत प्‍यार दिया। मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं। 12 साल के बाद आया हूं, लेकिन 12 साल में जो प्‍यार आपने समेट के रखा था, वो सारा प्‍यार की वर्षा आज आपने मेरे पर कर दी। ये प्‍यार, ये उमंग, ये विश्‍वास का प्रतीक है। ये आपकी उमंग और उत्‍साह, आपके भीतर जो सपने है उन सपनों का एहसास कराता है। और मैं मेरे प्‍यारे देश‍वासियों आपको विश्‍वास दिलाना चाहता हूं, आपके माध्‍यम से विश्‍वभर में फैले हुए मेरे भारतीय भाईयों-बहनों को विश्‍वास दिलाना चाहता हूं कि आपके passport का रंग कोई भी क्‍यों न हों, मेरा और आपका नाता उस खून के रंग के साथ जुड़ा हुआ है और जुड़ा रहेगा। आपके passport के रंग से आपके passport के रंग से तय नहीं होगा कि आप कौन है। हमारे लिए तो आप सब हमारे है। जितना अधिकार हिन्‍दुस्‍तान पर नरेंद्र मोदी का है उतना ही अधिकार आप सबका भी है। उस हमारी भारत मां के लिए, हम भी कोई संकल्‍प करें, हम भी भारत मां के जीवन के साथ जुड़ने का प्रयास करें, अपनी शक्ति, समय कभी न कभी मां भारती के लिए लगाने के लिए कभी न कभी सोचे। देश आपका इंतजार कर रहा है दोस्‍तों, देश आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

भारत, भारत आपको विश्‍वास दिलाता है कि आपके पास जो सामर्थ्‍य है उसमें खाद डालने का काम करने की ताकत भारत के गरीब से गरीब व्‍यक्ति में भी है। जो आपके सपनों को वटवृक्ष बना सकता है। आपके सपनों को पूरा करने के लिए उर्वरा धरती दे सकता है और उसके लिए मैं विश्‍वभर में फैले मेरे भारतीय भाईयो-बहनों को आग्रह से कहता हूं कि आइएं। देश आगे बढ़ रहा है, हम भी साथ-साथ चल पड़े, हम भी आगे बढ़े।

भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय। बहुत-बहुत धन्‍यवाद!

अतुल कुमार तिवारी / अमित कुमार / हरीश जैन, निर्मल, मधुप्रभा, लक्ष्‍मी 
(Release ID :130458)

Live Updates by NDTV

12 November 2015

PM Narendra Modi’s address to the British Parliament


PMO India Channel

Text of PM Narendra Modi’s address to the British Parliament

Lord Speaker,
Mr. Speaker,
Mr. Prime Minister

I am delighted to be in London. Even in this globalised world, London is still the standard for our times. The city has embraced the world’s diversity and represents the finest in human achievements. And, I am truly honoured to speak in the British Parliament.

Mr. Speaker, thank you for opening the doors to us, here in this magnificent setting of the Royal Court. I know that the Parliament is not in Session. Prime Minister Cameron looks relaxed and relieved.

But, I want to remind you, Mr. Prime Minister, that you owe me royalty for an election slogan. I know that you are hosting me at the Chequers this evening. But, I also know that you will understand if I am fair to both sides of the floor. Especially since British MPs of Indian Origin are evenly balanced between the Treasury and the Opposition benches. So, I also extend my good wishes to the Labour. Indeed, since these are still early days after the election, my warm congratulations to the Members of the House. And, greetings to the eminent leaders of Britain and great friends of India present here today.

So much of the modern history of India is linked to this building. So much history looms across our relationship. There are others who have spoken forcefully on the debts and dues of history. I will only say that many freedom fighters of India found their calling in the institutions of Britain. And, many makers of modern India, including several of my distinguished predecessors, from Jawaharlal Nehru to Dr. Manmohan Singh, passed through their doors.

There are many things on which it is hard to tell anymore if they are British or Indian: The Jaguar or the Scotland Yard, for example. The Brooke Bond tea or my friend late Lord Ghulam Nun’s curry. And, our strongest debates are whether the Lord’s pitch swings unfairly or the wicket at Eden Gardens cracks too early. And, we love the Bhangra rap from London just as you like the English novel from India.

On the way to this event, Prime Minister Cameron and I paid homage to Mahatma Gandhi outside the Parliament. I was reminded of a question I was asked on a tour abroad. How is it that the statue of Gandhi stands outside the British Parliament? To that question, my answer is: The British are wise enough to recognise his greatness; Indians are generous enough to share him; we are both fortunate enough to have been touched by his life and mission; and, we are both smart enough to use the strengths of our connected histories to power the future of our relationship.

So, I stand here today, not as a visiting Head of Government, given the honour to speak in this temple of democracy. I am here as a representative of a fellow institution and a shared tradition.

And, tomorrow, Prime Minister and I will be at the Wembley. Even in India, every young footballer wants to bend it like Beckham. Wembley will be a celebration of one-half-million threads of life that bind us; one and half million people - proud of their heritage in India; proud of their home in Britain.

It will be an expression of joy for all that we share: values, institutions, political system, sports, culture and art. And, it will be a recognition of our vibrant partnerships and a shared future.

The United Kingdom is the third largest investor in India behind Singapore and Mauritius. India is the third largest source of Foreign Direct Investment projects in the United Kingdom. Indians invest more in Britain than in the rest of European Union combined. It is not because they want to save on interpretation costs, but because they find an environment that is welcoming and familiar.

It takes an Indian icon, Tata, to run a British icon and become your nation’s largest private sector employer.

The UK remains a preferred destination for Indian students. And, I am pleased that an Indian company is taking a thousand British students to India to skill them in Information Technology.

We are working together in the most advanced areas of science and technology. We are finding solutions to the enduring human problems of food and health security, and seeking answers to emerging challenges like climate change.

Our security agencies work together so that our children return home safe and our increasingly networked lives are not prey to the threats on cyber space.

Our Armed Forces exercise with each other, so that they can stand more strongly for the values we represent. This year alone, we have had three exercises together.

And, in the international arena, your support has made it more possible for India to take her rightful place in global institutions and regimes. And, it has helped us both advance our common interests.

Mr. Speaker,

Strong as our partnership is, for a relationship such as ours, we must set higher ambitions. We are two democracies; two strong economies; and, two innovative societies.

We have the comfort of familiarity and the experience of a long partnership. Britain’s resurgence is impressive. Its influence on the future of the global economy remains strong.

And, Mr. Speaker, India is new bright spot of hope and opportunity for the world. It is not just the universal judgment of international institutions. It is not just the logic of numbers: a nation of 1.25 billion people with 800 million under the age of 35 years.

This optimism comes from the energy and enterprise of our youth; eager for change and confident of achieving it. It is the result of bold and sustained measures to reform our laws, policies, institutions and processes.

We are igniting the engines of our manufacturing sector; making our farms more productive and more resilient; making our services more innovative and efficient; moving with urgency on building global skills for our youth; creating a revolution in Startup enterprises; and, building the next generation infrastructure that will have a light footprint on the Earth.

Our momentum comes not just from the growth we pursue, but from the transformation that we seek in the quality of life for every citizen.

Much of India that we dream of still lies ahead of us: housing, power, water and sanitation for all; bank accounts and insurance for every citizen; connected and prosperous villages; and, smart and sustainable cities. These are goals with a definite date, not just a mirage of hope.

And, inspired by Gandhiji, the change has begun with us – the way the government works. There is transparency and accountability in governance. There is boldness and speed in decisions.

Federalism is no longer the fault line of Centre-State relations, but the definition of a new partnership of Team India. Citizens now have the ease of trust, not the burden of proof and process. Businesses find an environment that is open and easy to work in.

In a nation connected by cell phones, Digital India is transforming the interface between Government and people.

So, Mr. Speaker, with apologies to poet T.S. Eliot, we won’t let the shadow fall between the idea and reality.

If you visit India, you will experience the wind of change.

It is reflected in the surge of investments from around the world; in enhanced stability of our economy; in 190 million new bank accounts of hope and inclusion; in the increase in our growth to nearly 7.5% per year; and, in the sharp rise in our ranking on Ease of Doing Business.

And, the motto of Sab Ka Saath, Sab Ka Vikas, is our vision of a nation, in which every citizen belongs, participates and prospers.

It is not just a call for economic inclusion. It is also a celebration of our diversity; the creed for social harmony; and, a commitment to individual liberties and rights.

This is the timeless ethos of our culture; this is the basis of our constitution; and, this will be the foundation of our future.

Mr. Speaker,
Members and Friends,

The progress of India is the destiny of one-sixth of humanity. And, it will also mean a world more confident of its prosperity; and, more secure about its future.

It is also natural and inevitable that our economic relations will grow by leaps and bounds. We will form unbeatable partnerships, if we combine our unique strengths and the size and scale of opportunities in India.

We will see more investment and trade. We will open new doors in the Services sector. We will collaborate more – here and in India - in defence equipment and technology. We will work together on renewable and nuclear energy.

We will explore the mysteries of science and harness the power of technology and innovation. We will realise the opportunities of the digital world. Our youth will learn more from - and with - each other.

But, a relationship as rich as this, with so much promise as ours, cannot be measured only in terms of our mutual prosperity.

Mr. Speaker,

Ours is an age of multiple transitions in the world. We are yet to fully comprehend the future unfolding before us. As in the previous ages, it will be different from the world we know.

So, in the uncharted waters of our uncertain times, we must together help steer a steady course for this world in the direction that mirrors the ideals we share.

For, in that lies not just the success of our two nations, but also the promise of the world that we desire. We have the strength of our partnership and the membership of the United Nations, the Commonwealth and the G-20.

We live in a world where instability in a distant region quickly reaches our doorsteps. We see this in the challenges of radicalization and refugees.

The fault lines are shifting from the boundaries of nations into the web of our societies and the streets of our cities. And, terrorism and extremism are a global force that are larger than their changing names, groups, territories and targets.

The world must speak in one voice and act in unison to combat this challenge of our times. We must adopt a Comprehensive Convention on International Terrorism in the UN without delay. There should be no distinction between terrorist groups or discrimination between nations. There should be a resolve to isolate those who harbour terrorists and willingness to stand with nations that will fight them honestly. And, we need a social movement against extremism in countries where it is most prevalent and, every effort to delink religion and terrorism.

Oceans remain vital for our prosperity. Now, we have to also secure our cyber and outer space. Our interests are aligned across many regions. We have a shared interest in stable, prosperous and integrated South Asia, drawn together in a shared march to prosperity.

We want an Afghanistan that is shaped by the dreams of the great Afghan people, not by irrational fears and overreaching ambitions of others.

A peaceful, stable Indian Ocean Region is vital for global commerce and prosperity. And, the future of Asia Pacific region will have profound impact on all of us. We both have huge stakes in West Asia and the Gulf.

And, in Africa, where, amidst many challenges, we see so many promising signs of courage, wisdom, leadership and enterprise. India has just held an Africa Summit, in which all 55 countries, and 42 leaders participated.

We must also cooperate to launch a low carbon age for a sustainable future for our planet. This is a global responsibility that we must assume in Paris later this month.

The world has crafted a beautiful balance of collective action – common but differentiated responsibility and respective capabilities.

Those who have the means and the know-how must help meet the universal aspiration of humanity for clean energy and a healthy environment. And, when we speak of restraint, we must not only think of curbing fossil fuels, but also moderating our lifestyles.

We must all do our part. For India, a target of 175 GW of additional capacity in renewable energy by 2022 and reduction in emission intensity of 33-35 % by 2030 are just two of the steps of a comprehensive strategy.

I have also proposed to launch during the COP 21 meeting an International Solar Alliance to make solar energy an integral part of our lives, even in the most unconnected villages.

In Britain, you are more likely to use an umbrella against rain than the sun. But, my team defined the membership of the Solar Alliance in more precise terms: you have to be located within the Tropics.

And, we are pleased that the United Kingdom qualifies! So, we look forward to an innovative Britain as a valuable partner in this endeavour. Prime Minister Cameron and I are, indeed, very pleased that cooperation on affordable and accessible clean energy is an important pillar of our relations.

Mr. Speaker,

This is a huge moment for our two great nations. So, we must seize our opportunities, remove the obstacles to cooperation, instill full confidence in our relations and remain sensitive to each other’s interests.

In doing so, we will transform our strategic partnership, and we will make this relationship count as one of the leading global partnerships. Ever so often, in the call of Britain’s most famous Bard that we must seize the tide in the affairs of men, the world has sought the inspiration to act. And, so must we.

But, in defining the purpose of our partnership, we must turn to a great son of India, whose house in London I shall dedicate to the cause of social justice on Saturday. Dr. B. R. Ambedkar, whose 125th birth anniversary we are celebrating now, was not just an architect of India’s Constitution and our parliamentary democracy. He also stood for the upliftment of the weak, the oppressed and the excluded. And, he lifted us all to a higher cause in the service of humanity; to build a future of justice, equality, opportunity and dignity for all humans; and, peace among people.

That is the cause to which India and the United Kingdom have dedicated themselves today.

Thank you very much, thanks a lot.

Friday, November 13, 2015

Bihar 2015 Exit Poll Estimates and Actual Results - An Instance Where Estimates Have Gone Wrong

NDTV Exit Polls

The poll predicted a majority for NDA.  125 seats. They made a meticulous poll of each phase and vote shares in each phase.


6 November 2015

Election Results

JDU+  178


Rajya Sabha TV

Thursday, November 12, 2015

Monday, November 9, 2015

Dhanteras Festival - Puja Vidhi

According to some Lakshmi Devi was born on this day during amrit manthan. Dhanvantari also came along with her. She married Vishnu on Deepavali Amavasya.

Dhanteras is celebrated as the birthday of Lakshmi. Like Krishna Ashtami day, this day also rangoli with small steps is made to welcome the new born Lakshmi.


Zee News

Dhanteras Puja Vidhi – How to do puja on Dhanteras to get Good Health, Prosperity

Diwali 2015 Dhanteras special: Know Pradosh Kaal Puja Muhurat, Puja Vidhi & auspicious timings of Dhanteras

Deepavali - Diwali Lakshmi Puja Procedure in English Script

Saturday, November 7, 2015

Five Day Festival of Diwali


Reshared by Narayana Rao

Diwali is a five-day festival in many regions of India,


Dhanteras starts off the five day festival. For the festival, houses and business premises are cleaned, renovated and decorated. The entrances are decorated with Rangoli – creative colourful floor designs both inside and in the walkways of their homes or offices. This day marks the birthday of Lakshmi – the Goddess of Wealth and Prosperity, and the birthday of Dhanvantari – the God of Health and Healing during the Amrit Manthan by Angels and Demons. On the night of Dhanteras, diyas (lamps) are ritually kept burning all through the nights in honor of Lakshmi and Dhanvantari.

Dhanteras day is considered auspicious to buy gold or silver articles.  Lakshmi Puja is performed in the evening.

Naraka Chaturdasi

Narak Chaturdasi is the second day of festivities, and is also called Choti Diwali. Oil bathing rituals are held on this day in some regions, followed by minor pujas. Women decorate their hands with henna designs. Families are also busy preparing sweets for main Diwali.

Diwali - Lakshmi Puja

The day  is the main festive day. People wear new clothes as the evening approaches. Then diyas are lit, puja is offered to Lakshmi, and  also to and Kubera. They both symbolise wealth and prosperity, and their  blessings are sought  for a good year ahead.

Lakshmi is believed to roam the earth on Diwali night.  People invite her into their homes with various decorations of the house with diyas.  On this day, the house lady  is seen to embody a part of Lakshmi, the good fortune and prosperity of the household. In some parts of India, important relationships and friendships are also recognized during the day, by visiting relatives and friends, exchanging gifts and sweets.

After the Lakshmi puja, people go outside and celebrate by lighting up fireworks. The children enjoy sparklers and variety of small fireworks, while adults enjoy playing with ground chakra, Vishnu chakra, flowerpots, bombs, rockets and  otherbigger fireworks. The fireworks signify celebration of Diwali as day to signify victory over  evil of the days. After fireworks, people enjoy the family feast, with sweets.

Diwali Padwa, Balipratipada

The day after Diwali Amavasya, is celebrated as Diwali Padwa. This day is celebration of  the love and mutual devotion between the wife and husband.  Gifts are exchanged between spouses. In many regions, newly married daughters with their husbands are invited for special meals. On this day,  Goverdhan puja is performed in honor of Lord Krishna.

Diwali Pratipad also marks the beginning of new year, in some parts of India, where the Hindu Vikram Samvat calendar is popular. Merchants and shopkeepers close out their old year on Diwali Amavasya and start the books of  a new fiscal year after seeking blessings from Lakshmi and other deities.

Bhai Duj, Bhaiya Dooji

The last day of the five day festival is called Bhai dooj (Brother’s second) or Bhai tika in Nepal,  On this ladies and girls  perform pujas with prayers for the well being of their brothers.  In historic times, this was a day in autumn when brothers would travel to meet their sisters, or bring over their sister’s family to their village homes to celebrate their sister-brother bond with the bounty of seasonal harvests.


Reshared by Narayana Rao

Thursday, November 5, 2015

Prof. Amartya Sen - Publications

Sen, A.K. (1957a) A note on foreign exchange requirements of development plans, Economica Internazionale, 10, pp. 248-254.
Sen, A.K. (1957b) A note on Tinbergen on the optimum rate of saving, Economic Journal, 67, pp. 745-748.
Sen, A.K. (1957c) Some notes on the choice of capital-intensity in development planning, Quarterly Journal of Economics, 71, pp. 561-584.
Sen, A.K. (1957d) Unemployment, relative prices and the savings potential, Indian Economic Review, 3, pp. 56-63.
Sen, A.K. (1958) A note on the Mahalanobis model of sectoral planning, Arthaniti, 1, pp. 26-33.
Sen, A.K. (1959a) The choice of agricultural techniques in underdeveloped countries, Economic Development and Cultural Change, 7, pp. 279-285.
Sen, A.K. (1959b) Choice of capital-intensity further considered, Quarterly Journal of Economics, 73, pp. 466-484.
Sen, A.K. (1959c) Determinism and historical predictions, Enquiry, 2.
Sen, A.K. (1960a) Choice of Techniques (Oxford, Basil Blackwell).
Sen, A.K. (Ed.)(1960b) Growth Economics (Harmondsworth, Penguin Books).
Sen, A.K. (1961) On optimizing the rate of saving, Economic Journal, 71, pp. 479-496.
Sen, A.K. (1962a) An aspect of Indian agriculture, Economic Weekly, Annual Number, 16.
Sen, A.K. (1962b) Neo-classical and neo-Keynesian theories of distribution, Economic Record, 39, pp. 53-64.
Sen, A.K. (1962c) On the usefulness of used machines, Review of Economics and Statistics, 44, pp. 346-362.
Sen, A.K. (1963a) Distribution, transitivity and Little's welfare criterion, Economic Journal, 73, pp. 771-778.
Sen, A.K. (1963b) The money rate of interest in the pure theory of growth, in: F. Hahn & F. Brechling (Eds) Theories of the Rate of Interest (London, Macmillan).
Sen, A.K. (1964a) The efficiency of indirect taxes, in: Problems of Economic Dynamics and Planning: essays in honour of M. Kalecki (New York & Oxford, Pergamon Press).
Sen, A.K. (1964b) A planning model for the educational requirements of economic development: comments, in: Residual Factor and Economic Growth (Paris, OECD).
Sen, A.K. (1964c) Preferences, votes and the transitivity of majority decisions, Review of Economic Studies, 31, pp. 163-165.
Sen, A.K. (1964d) Size of holdings and productivity, Economic Weekly, Annual Number, 16, pp. 323-326.
Sen, A.K. (1964e) Surplus labour and the degree of mechanization, in: K. Berrill (Ed.) Economic Development with Special Reference to East Asia (London, Macmillan), pp. 386-398.
Sen, A.K. (1964f) Working capital in the Indian economy, in: P.N. Rosenstein-Rodan (Ed.) Pricing and Fiscal Policies (London, Allen & Unwin), pp. 125-146.
Sen, A.K. (1965a) The commodity pattern of British enterprise in early Indian industrialization 1854-1914, in: Proceedings of the Second International Conference of Economic History (Paris), pp. 781-816.
Sen, A.K. (1965b) Mishan, Little and welfare: a reply, Economic Journal, 75, p. 442.
Sen, A.K. (1966a) Economic approaches to education and manpower planning, Indian Economic Review, New Series, 1, pp. 1-21.
Sen, A.K. (1966b) Education, vintage and learning by doing, Journal of Human Resources, 1, pp. 3-21.
Sen, A.K. (1966c) Hume's law and Hare's rule, Philosophy, 155, pp 75-79.
Sen, A.K. (1966d) Labour allocation in a cooperative enterprise, Review of Economic Studies, 33, pp. 361-371.
Sen, A.K. (1966e) Peasants and dualism with or without surplus labor, Journal of Political Economy, 74, pp. 425-450.
Sen, A.K. (1966f) A possibility theorem on majority decisions, Econometrica, 34(2), pp. 49-109.
Sen, A.K. (1967a) Isolation, assurance and the social rate of discount, Quarterly Journal of Economics, 81, pp. 112-124.
Sen, A.K. (1967b) The nature and classes of prescriptive judgements, Philosophical Quarterly, 17.
Sen, A.K. (1967c) The pattern of British enterprise in early Indian industrialization, 1854-1914, in: B. Singh & V.B. Singh (Eds) Social and Economic Change (Bombay, Allied Publishers), pp. 409-429.
Sen, A.K. (1967d) Surplus labour in India: a critique of Schultz's statistical test, Economic Journal, 77, pp. 154-161.
Sen, A.K. (1967e) Terminal capital and optimum savings, in: C.H. Feinstein (Ed.) Socialism, Capitalism and Economic Growth (London, Cambridge University Press), pp. 40-53.
Sen, A.K. (1968) General criteria of industrial project evaluation, in: Evaluation of Industrial Projects (New York, UN Industrial Development Organization).
Sen, A.K. (1969a) Choice functions and revealed preference, Review of Economic Studies, 36(1), pp. 381-393.
Sen, A.K. (1969b) Choice of techniques: a critical survey of a class of debates, in: Planning for Advanced Skills and Technologies (New York, United Nations).
Sen, A.K. (1969c) A game-theoretic analysis of theories of collectivism in allocation, in: T. Majumdar (Ed.) Growth and choice (London, Oxford University Press), pp. 1-17.
Sen, A.K. (1969d) Planner's preferences: optimality, distribution and social welfare, in: J. Margolis and H. Guitton (Ed.) Public Economics (London, Macmillan), pp. 201-221.
Sen, A.K. (1969e) Quasi-transitivity, rational choice and collective decision, Review of Economic Studies, 36(1), pp. 381-393.
Sen, A.K. (1969f) The role of policy-makers in project formulation and evaluation, Industrialization and Productivity, Bulletin 13 (New York, United Nations).
Sen, A.K. (1970a) Aspects of Indian education, in: S.C. Malik (Ed.) Management and Organization of Indian Universities (Simla, Institute of Advanced Study).
Sen, A.K. (1970b) Collective Choice and Social Welfare (San Francisco, Holden Day)
Sen, A.K. (1970c) The impossibility of a Paretian liberal, Journal of Political Economy, 78(1), pp. 152-157.
Sen, A.K. (1970d) Interpersonal aggregation and partial comparability, Econometrica, 38(3), pp. 393-409.
Sen, A.K. (1970e) Interrelations between project, sectoral and aggregate planning, Economic Bulletin for Asia and the Far East, 21.
Sen, A.K. (1970f) Models of educational planning and their applications, Journal of Development, 2.
Sen, A.K. (1970g) Strategies of economic development: feasibility constraints and planning, in: E.A.G. Robinson & M. Kidron (Eds) Economic Development in South Asia (London, Macmillan), pp. 369-378.
Sen, A.K. (1971a) Choice functions and revealed preference, Review of Economic Studies, 38(115), pp. 304-317.
Sen, A.K. (1971b) The impossibility of a Paretian liberal: a reply, Journal of Political Economy, 79, pp. 1406-1407.
Sen, A.K. (1971c) A quantitative study of brain drain from the developing countries to the United States, Journal of Development Planning, 3.
Sen, A.K. (1972a) Aspects of Indian education, in: P. Chaudhuri (Ed.) Aspects of Indian Economic Development (London, Allen & Unwin).
Sen, A.K. (1972b) Control areas and accounting prices: an approach to economic evaluation, Economic Journal, 82(325), pp. 486-501.
Sen, A.K. (1972c) Interpersonal comparison and partial comparability: a correction, Econometrica, 40(5), p. 959.
Sen, A.K. (1972d) Objectivity and Position (Kansas, University of Kansas).
Sen, A.K. (1973a) Behaviour and the concept of preference, Economica, 40, pp. 241-259.
Sen, A.K. (1973b) Brain drain: causes and effects, in: B.R. Williams (Ed.) Science and Technology in Economic Growth (London, Macmillan), pp. 385-404.
Sen, A.K. (1973c) Dimensions of Unemployment in India (Calcutta, Indian Statistical Institute).
Sen, A.K. (1973d) On Economic Inequality (Oxford, Clarendon Press).
Sen, A.K. (1973e) On ignorance and equal distribution, American Economic Review 63(5), pp. 1022-1024.
Sen, A.K. (1973f) On the development of basic income indicators to supplement the GNP measure, United Nations Economic Bulletin for Asia and the Far East, 24(2-3), pp. 1-11.
Sen, A.K. (1973g) Poverty, inequality and unemployment: some conceptual issues in measurement, Economic and Political Weekly, 8, pp. 1457-1464.
Sen, A.K. (1974a) Choice, orderings and morality, in: S. Korner (Ed.) Practical Reason (Oxford, Blackwell), pp. 54-67.
Sen, A.K. (1974b) Informational bases of alternative welfare approaches: aggregation and income distribution, Journal of Public Economics, 3(4), pp. 387-403.
Sen, A.K. (1974c) On some debates in capital theory, Economica, 41(163), pp. 328-335.
Sen, A.K. (1974d) Poverty, inequality and unemployment: some conceptual issues in measurement, Sankhya: The Indian Journal of Statistics, 36, pp. 67-82.
Sen, A.K. (1974e) Rawls versus Bentham: an axiomatic examination of the pure distribution problem, Theory and Decision, 4, pp. 283-292.
Sen, A.K. (1975a) The concept of efficiency, in: M. Parkin and A.R. Nobay (Eds) Contemporary Issues in Economics (Manchester, Manchester University Press), pp. 196-210.
Sen, A.K. (1975b) Employment, institutions and technology: some policy issues, International Labour Review, 112(1), pp. 45-73.
Sen, A.K. (1975c) Employment, Technology & Development (Oxford, Clarendon Press).
Sen, A.K. (1975d) Is a Paretian liberal really impossible?: A reply, Public Choice, 21(21), pp. 111-113.
Sen, A.K. (1975e) Minimal conditions for monotonicity of capital value, Journal of Economic Theory, 11(3), pp. 340-355.
Sen, A.K. (1976a) Famines as failures of exchange entitlements, Economic and Political Weekly, 11, pp. 1273-1280.
Sen, A.K. (1976b) Liberty, unanimity and fights, Economica, 43(171), pp. 217-245.
Sen, A.K. (1976c) Poverty: an ordinal approach to measurement, Econometrica, 44(2), pp. 219-231.
Sen, A.K. (1976d) Poverty and Economic Development (Ahmedabad, Vikram A. Sarabhai AMA Memorial Trust).
Sen, A.K. (1976e) Real national income, Review of Economic Studies, 43(1), pp. 19-39.
Sen, A.K. (1976f) Social choice theory: a re-examination, Econometrica, 45(1), pp. 53-89.
Sen, A.K. (1976g) Welfare inequalities and Rawlsian axiomatics, Theory and Decision, 7.
Sen, A.K. (1977a) Non linear social welfare functions: A Reply to Prof. Harsanyi, in: R. Butts & J. Hintikka (Eds) Foundational Problems in the Social Sciences (Dordrecht, Reidel), pp. 297-302.
Sen, A.K. (1977b) On the approach to planning against hunger, CERES: FAO Review on Agriculture and Development, 58.
Sen, A.K. (1977c) On weights and measures: informational constraints in social welfare analysis, Econometrica, 45(7), pp. 1539-1572.
Sen, A.K. (1977d) Poverty and welfarism, Intermountain Economic Review, 8(1), pp. 1-13.
Sen, A.K. (1977e) Rational Fools: A critique of the behavioral foundations of economic theory, Philosophy and Public Affairs, 6 (4), pp. 317-344.
Sen, A.K. (1977f) Social choice theory: a re-examination, Econometrica, 45(1), pp. 53-89.
Sea, A.K. (1977g) Starvation and exchange entitlements: a genera[ approach and its application to the Great Bengal Famine, Cambridge Journal of Economics, 1(1), pp. 33-59.
Sen, A.K. (1977h) The statistical chickens, CERES, 10(4), pp. 14-17
Sen, A.K. (1978a) Ethical measurement of inequality: some difficulties, in: W. Krelle & A.F. Shorrocks (Eds) Personal Income Distribution (Amsterdam, North-Holland), pp. 81-94.
Sen, A.K. (1978b) On the labour theory of value: some methodological issues, Cambridge Journal of Economics, 2, pp. 175-190.
Sen, A.K. (1978c) Welfare theory, in: Beckmann, Menges & Selten (Eds) Encyclopedic Handbook of Mathematical Economic Sciences (Gabler).
Sen, A.K. (1979a) Informational analysis of moral principles, in: R. Harrison (Ed.) Rational Action (Cambridge, Cambridge University Press), pp. 115-132.
Sen, A.K. (1979b) Interpersonal comparisons of welfare, in: M. Boskin (Ed.) Economics and Human Welfare (New York, Academic Press), pp. 183-201.
Sen, A.K. (1979c) Issues in the measurement of poverty, Scandinavian Journal of Economics, 81, pp. 285-307.
Sen, A.K. (1979d) Personal utilities and public judgements: or what's wrong with welfare economics, Economic Journal, 89(355), pp. 537-558.
Sen, A.K. (1979e) Strategies and revelation: informational constraints in public decisions, in: J.J. Laffont (Ed) Aggregation and Revelation of Preferences (Amsterdam, North Holland), pp. 13-28.
Sen, A.K. (1979f) Utilitarianism and welfarism, Journal of Philosophy, 76, pp. 463-488.
Sen, A.K. (1979g) The welfare basis of real income comparisons: a survey, Journal of Economics Literature, 17(1), pp. 1-45.
Sen, A.K. (1980a) Description as choice, Oxford Economic Papers, 32, pp. 353-369.
Sen, A.K. (1980b) Economic development: objectives and obstacles, in: R.F. Dernberger (Ed.) China's Development Experience in Comparative Perspective (Cambridge, Harvard University Press), pp. 19-37.
Sen, A.K. (1980c) Equality of what?, in: S. McMurrin (Ed.), Tanner Lectures on Human Values, Vol. I (Cambridge, Cambridge University Press), pp. 197-220.
Sen, A.K. (1980d) Famine mortality: a study of the bengal famine of 1943, in: E.J. Hobsbawm, A. Mitra, K.N. Raj, I. Sachs, & A. Thorner (Eds) Peasants in History: essays in memory of Daniel Thorner (Calcutta, Oxford University Press), pp. 194-220.
Sen, A.K. (1980e) Famines, World Development, 8, pp. 613-621.
Sen, A.K. (1980f) Labour and technology, in: J. Cody, H. Hughes & D. Walls (Eds) Policies for Industrial Progress in Development Countries (New York, Oxford University Press), pp. 121-158.
Sen, A.K. (1980g) The welfare basis of real income comparisons: a reply, Journal of Economic Literature, 18, pp. 1547-1552
Sen, A.K. (1980-81) Plural utility, Proceedings of the Aristotelian Society, 80.
Sen, A.K. (1981a) Economic development: objectives and obstacles, in: R.F. Demberger (Ed) China's Development Experience in Comparative Perspective (Cambridge, Harvard University Press).
Sen, A.K. (1981b) Ethical issues in income distribution: national and international, in: Grassman & E. Lundberg (Eds) The World Economic Order: Past and Prospects (London, Macmillan), pp. 464-494.
Sen, A.K. (1981c) Ingredients of famine analysis: availability and entitlements, Quarterly Journal of Economics, 95, pp. 433-464.
Sen, A.K. (1981d) A positive concept of negative freedom, in: E. Morscher & R. Stranzinger (Eds) Proceedings of the 5th International Wittgenstein Symposium (Vienna, Holder-Pichler-Tempsky).
Sen, A.K. (1981e) Poverty and Famines: an essay on entitlement and depression (Oxford, Oxford University Press).
Sen, A.K. (1981f) Public action and the quality of life in developing countries, Oxford Bulletin of Economics and Statistics, 43, pp. 287-319.
Sen, A.K. (1981g) A reply to welfarism: a defense against Sen's attack, Economic Journal, 91, pp. 531-535.
Sen, A.K. (1982a) Choice, Welfare and Measurement (Oxford, Basil Blackwell).
Sen, A.K. (1982b) The food problem: theory and policy, Third World Quarterly, 4, pp. 447-459.
Sen, A.K. (1982c) How is India doing?, New York Review of Books, 29, pp. 41-45.
Sen, A.K. (1982d) Liberty as control: an appraisal, Midwest Studies in Philosophy, 7, pp. 207-221.
Sen, A.K. (1982e) Approaches to the choice of discount rates for social cost benefit analysis, in: R. Lind (Ed.) Discounting for Time and Risk in Energy Policy (Washington, D.C., Resources for the Future), pp. 325-353.
Sen, A.K. (1982f) The right not to be hungry, in: G. Floistad (Ed.) Contemporary Philosophy: A New Survey, Vol. 2 (The Hague, Martinus Nijhoff), pp. 343-360.
Sen, A.K. (1982g) Rights and agency, Philosophy and Public Affairs, 11(2), pp. 113-132.
Sen, A.K. (1983a) Accounts, actions and values: objectivity of social science, in: C. Lloyd (Ed.) Social Theory and Political Practice (Oxford, Clarendon Press), pp. 87-107.
Sen, A.K. (1983b) Carrots, sticks and economics: perception problems in economics, Indian Economic Review, 18, pp. 1-16.
Sen, A.K. (1983c) Development: which way now?, Economic Journal, 93, pp. 745-762.
Sen, A.K. (1983d) Economics and the family, Asian Development Review, 1, pp. 14-16.
Sen, A.K. (1983e) Evaluator relativity and consequential evaluation, Philosophy and Public Affairs, 12(2), pp. 113-132.
Sen, A.K. (1983f) Liberty and social choice, Journal of Philosophy, 80(1), pp. 5-28.
Sen, A.K. (1983g) Poor, relatively speaking, Oxford Economic Papers, 35(2), pp. 153-169.
Sen, A.K. (1983h) The profit motive, Lloyds Bank Review, 147.
Sen, A.K. (1984a) Food battles: conflicts in access to food, Food and Nutrition, 10.
Sen, A.K. (1984b) The living standard, Oxford Economic Papers, 36, pp. 74-90.
Sen, A.K. (1984c) Resources, Values and Development (Oxford, Blackwell & Cambridge, Harvard University Press).
Sen, A.K. (1985a) Commodities and Capabilities (Amsterdam, North Holland).
Sen, A.K. (1985b) Goals, commitment, and identity, Journal of Law, Economics and Organization, 1(2), pp. 341-355.
Sen, A.K. (1985c) The moral standing of the market, in: E.F. Paul, F.D. Miller, Jr. & J. Paul (Eds) Ethics and Economics (Oxford, Basil Blackwell), pp. 1-19.
Sen, A.K. (1985d) Rationality and uncertainty, Theory and Decision, 18, pp. 109-127.
Sen, A.K. (1985e) A reply to Professor Townsend, Oxford Economic Papers, 37, pp. 669-676.
Sen, A.K. (1985f) Rights and capabilities, in: T. Honderich (Ed.) Morality and Objectivity (London, Routledge), pp. 130-148.
Sen, A.K. (1985g) Rights as goals, in: S. Guest & A. Milne (Eds) Equality and Discrimination: Essays in Freedom and Justice (Stuttgart, Franz Steiner), pp. 11-25.
Sen, A.K. (1985h) Social choice and justice: a review article, Journal of Economic Literature, 23, pp. 1764-1776.
Sen, A.K. (1985i) Well-being, agency and freedom: the Dewey Lectures 1984, Journal of Philosophy, 82, pp. 169-221.
Sen, A.K. (1985j) Women, technology and sexual divisions, Trade and Development (UNCTAD), 6.
Sen, A.K. (1986a) Adam Smith's prudence theory and reality in development, in: S. Lall & F. Stewart (Eds) Essays in Honour of Paul Streeten (New York, St. Martin's Press), pp. 28-37.
Sen, A.K. (1986b) The causes of famine: a reply, Food Policy, 11, pp. 125-132.
Sen, A.K. (1986c) The concept of well-being, in: S. Guhan & M. Shroff (Eds) Essays on Economic Progress and Welfare: in honour of I.G. Patel (Oxford, Oxford University Press), pp. 174-192.
Sen, A.K. (1986d) Economic distance and the living standard, in: K. Ahooja-Patel, A.G. Drabek & M. Nerfin (Eds) World Economy in Transition: essays presented to Surendre Patel on his sixtieth birthday (Oxford & New York, Pergamon Press), pp. 63-74.
Sen, A.K. (1986e) Food, economics and entitlements, Lloyds Bank Review, 160, pp. 3-20.
Sen, A.K. (1986f) Foundations of social choice theory: an epilogue, in: J. Elster & A. Hylland (Eds) Foundations of Social Choice Theory (New York, Cambridge University Press), pp. 213-248.
Sen, A.K. (1986g) Information and invariance in normative choice, in: W.P. Heller, R.M. Starr, & D.A. Starret (Eds) Essays in Honor of Kenneth J. Arrow, Vol. I (Cambridge, Cambridge University Press), pp. 29-55.
Sen, A.K. (1986h) Planning and the judgement of economic progress, Review of Indian Planning Processes: Proceedings of the Golden Jubilee Celebrations of the Indian Statistical Institute (Calcutta, I.S.I.).
Sen, A.K. (1986i) Prediction and economic theory, in: J. Mason, P. Mathias & J.H. Westcott (Eds) Predictability in Science and Society (London, The Royal Society & The British Academy), pp. 3-22.
Sen, A.K. (1986j) Rationality, interest and identity, in: A. Foxley, M. McPherson & G. O'Donnell (Eds) Development, Democracy, and the Art of Trespassing (Notre Dame, University of Notre Dame Press), pp. 343-353.
Sen, A.K. (1986k) The right to take personal risks in: D. MacLean (Ed.) Values at Risk (Totowa, NJ, Rowman and Allanheld), pp. 155-169.
Sen, A.K. (1986l) Social choice theory in: K.J. Arrow & M. Intriligator (Eds) Handbook of Mathematical Economics, Vol. III (Amsterdam, North-Holland), pp. 1073-1181.
Sen, A.K. (1986m) Welfare Economics and the Real World (Memphis: P.K. Seidman Foundation).
Sen, A.K. (1987a) Defense spending as a priority: comment, in: C. Schmidt & F. Blackaby (Eds) Peace, Defense and Economic Analysis (New York, St. Martin's Press), pp. 45-49.
Sen, A.K. (1987b) Goods and people, in: V.L. Urguidi (Ed.) Structural Change, Economic Interdependence and World Development, Vol. 1 (New York, St. Martin's Press), pp. 153-177.
Sen, A.K. (1987c) Hunger and Entitlements (Helsinki, WIDER).
Sen, A.K. (1987d) Justice, in: J. Eatwell, M. Milgate & P. Newman (Eds) The New Palgrave: a dictionary of economics Vol. 2 (London, Macmillan), pp. 1039-1043.
Sen, A.K. (1987e) On Ethics and Economics (Oxford & New York, Basil Blackwell).
Sen, A.K. (1987f) Maurice Herbert Dobb, in: J. Eatwell, M. Milgate & P. Newman (Eds) The New Palgrave: a dictionary of economics, Vol. I (London, Macmillan), pp. 910-912.
Sen, A.K. (1987g) Rational behaviour, in: J. Eatwell, M. Milgate & P. Newman (Eds) The New Palgrave: a dictionary of economics, Vol. 4 (London, Macmillan), pp. 68-76.
Sen, A.K. (1987h) Reply: famines and Mr. Bowbrick, Food Policy, 12, pp. 10-14.
Sen, A.K. (1987i) Social choice, in: J. Eatwell, M. Milgate & P. Newman (Eds) The New Palgrave: a dictionary of economics, Vol. 4 (London, Macmillan), pp. 382-393.
Sen, A.K. (1987j) The Standard of Living, Tanner Lectures with discussion by J. Muellbauer and others (Cambridge, Cambridge University Press).
Sen, A.K. (1988a) Africa and India: what do we have to learn from each other?, in: K.J. Arrow (Ed.), The Balance between Industry and Agriculture in Economic Development, Vol. 1 (London, Macmillan), pp. 105-37.
Sen, A.K. (1988b) The concept of development, in: H.B. Chenery & T.N. Srinivasan (Eds) Handbook of Development Economics, Vol. 1 (Amsterdam, North-Holland), pp. 9-26.
Sen, A.K. (1988c) Family and food: sex bias in poverty, in: T.N. Srinivasan & P.K.Bardhan (Eds) Rural Poverty in South Asia (New York, Columbia University Press), pp. 453-472.
Sen, A.K. (1988d) Freedom of choice: concept and content, European Economic Review, 32, pp. 269-294.
Sen, A.K. (1988e) Property and hunger, Economic Philosophy, 4, pp. 57-68.
Sen, A.K. (1988f) Sri Lanka's achievements: how and when, in: T.N. Srinivasan & P.K. Bardhan (Eds), Rural Poverty in South Asia (New York, Columbia University Press) pp. 549-556.
Sen, A.K. (1989a) Economic methodology: heterogeneity and relevance, Social Research, 56, pp. 299-329.
Sen, A.K. (1989b) Food and freedom, World Development, 17(6), pp. 769-781.
Sen, A.K. (1989c) Indian development: lessons and non-lessons, Daedalus, 118, pp. 369-392.
Sen, A.K. (1989d) Women's survival as a development problem, Bulletin of the American Academy of Arts and Sciences, 43.
Sen, A.K. (1990a) Entitlements and the Chinese famine, Food Policy, 15.
Sen, A.K. (1990b) Food entitlements and economic chains, in: L.F. Newman (Ed.) Hunger in History (Oxford, Blackwell), pp. 374-386.
Sen, A.K. (1990c) Gender and cooperative conflict, in: I. Tinker (Ed) Persistent Inequalities (New York, Oxford University Press), pp. 123-149.
Sen, A.K. (1990d) Individual freedom as a social commitment, New York Review of Books, 37(10), pp. 49-54.
Sen, A.K. (1990e) Justice: means versus freedoms, Philosophy and Public Affairs, 19, pp. 111-121.
Sen, A.K. (1990f) More than 100 million women are missing, New York Review of Books, 37(20), pp. 61-66.
Sen, A.K. (1990g) Public action for social security, in: E. Ahmed et al. (Eds) Social Security in Developing Countries (Oxford, Clarendon Press).
Sen, A.K. (1990h) Public Action to Remedy Hunger (New York, The Hunger Project).
Sen, A.K. (1990i) Welfare, freedom and social choice: a reply, Recherches economiques de Louvain, 56, pp. 451-485.
Sen, A. K. (1991a) The nature of inequality, in: K.J. Arrow (Ed.) Markets and Welfare, (London, Macmillan), pp. 3-21.
Sen, A.K. (1991b) Utility: ideas and terminology, Economics and Philosophy, 7, pp. 277-283.
Sen, A.K. (1991c) Welfare, preference and freedom, Journal of Econometrics, 50, pp. 15-29.
Sen, A.K. (1991d) What did you learn in the world today?, American Behavioral Scientist, 34, pp. 530-548.
Sen, A.K. (1992a) Inequality Re-examined (Oxford: Clarendon Press & Cambridge, MA: Harvard University Press).
Sen, A.K. (1992b) Life and death in China: a reply, World Development, 20, pp. 1305-1312.
Sen, A.K. (1992c) Minimal liberty, Economica, 59(234), pp. 139-160.
Sen, A.K. (1992d) Missing women, British Medical Journal, 304(6827), pp. 587-588.
Sen, A.K. (1993a) Capability and well-being, in: M. Nussbaum & A.K. Sen (Eds) The Quality of Life (Oxford, Oxford University Press), pp. 30-53.
Sen, A.K. (1993b) The causation and prevention of famines: a reply, Journal of Peasant Studies.
Sen, A.K. (1993c) Does business ethics make economic sense?, Journal of Business Ethics, pp. 53-66.
Sen, A.K. (1993d) The economics of life and death, Scientific American, 268(5), pp. 40-47.
Sen, A.K. (1993e) India and the west, New Republic, 208(23), pp. 27-34.
Sen, A.K. (1993f) Indian pluralism, India International Centre Quarterly.
Sen, A.K. (1993g) Internal consistency of choice, Econometrica, 61, pp. 495-521.
Sen, A.K. (1993h) The labour-capital partnership: reconciling insider power with full employment: comment, in: A.B. Atkinson (Ed.) Alternatives to Capitalism: The Economics of Partnership (New York, St. Martin's Press & London, Macmillan), pp. 78-80.
Sen, A.K. (1993i) Life expectancy and inequality: some conceptual issues, in: P. Bardhan et al. (Eds) Development and Change (Oxford, Oxford University Press), pp. 3-11.
Sen, A.K. (1993j) Markets and freedoms, Oxford Economic Papers, 45, pp. 519-551.
Sen, A.K. (1993k) On the Darwinian view of progress, Population and Development Review, 19(1), pp. 123-137.
Sen, A.K. (1993l) Positional objectivity, Philosophy and Public Affairs, 22, pp. 126-145.
Sen, A.K. (1993m) Sukhamoy Chakravarty: an appreciation, in: K. Basu & M. Majumdar (Eds) Capital Investment and Development: Essays in Memory of Sukhamoy Chakravarty (Delhi, Oxford University Press), pp. xi-xx.
Sen, A.K. (1993n) The third way: inside the firm or out in the economy?, in: A.B. Atkinson (Ed.) Alternatives to Capitalism: the economics of partnership (New York, St. Martin's Press & London, Macmillan), pp. 278-282.
Sen, A.K. (1993o) The threats to secular India, New York Review of Books, 40(7), pp. 26-32.
Sen, A.K. (1994a) Amiya Kumar Dasgupta (1903-1992), Economic Journal, 104(426), pp. 1147-1154.
Sen, A.K. (1994b) The Darwinian view of progress: reply to Guha, Population & Development Review, 20, pp. 866-870.
Sen, A.K. (1994c) Economic Wealth and Moral Sentiments (Zurich, Bank Hoffman).
Sen, A.K. (1994d) The formulation of rational choice, American Economic Review, 84(2), pp. 385-390.
Sen, A.K. (1994e) Freedoms and needs, New Republic, 210(2-3), pp. 31-38.
Sen, A.K. (1994f) Growth economics: what and why?, in: L. Pasinetti & R. Solow (Eds) Economic Growth and the Structure of Long-Term Development (London, Macmillan), pp. 363-368.
Sen, A.K. (1994g) Liberty and poverty, Current, (362), pp. 22-28.
Sen, A.K. (1994h) Markets and the freedom to choose, in: H. Siebert (Ed.) The Ethical Foundations of the Market Economy (Tubingen, J.C.B. Mohr), pp. 123-138.
Sen, A.K. (1994i) Non-binary choice and preference: a tribute to Stig Kanger, in: D. Prawitz et al. (Eds) Logic, Methodology and Philosophy of Science, IX (Amsterdam, Elsevier Science).
Sen, A.K. (1994j) Objectivity and position: assessment of health and well-being, in: L. Chen & A. Kleinman (Eds) Health and Social Change in International Perspective (Cambridge, Harvard University Press), pp. 115-128.
Sen, A.K. (1994k) On the Darwinian view of progress: a reply, Population and Development Review, pp. 866-870.
Sen, A.K. (1994l) The political economy of hunger, in: I. Serageldin & P. Landell-Mills (Eds) Overcoming Global Hunger (Washington, D.C., World Bank), pp. 85-90.
Sen, A.K. (1994m) Population: delusion and reality, New York Review of Books, 41(15), pp. 62-71.
Sen, A.K. (1994n) Population and reasoned agency, in: K. Lindahl-Kiessling and H. Landberg (Eds) Population, Economics Development, and the Environment (Oxford, Oxford University Press), pp. 51-78.
Sen, A.K. (1994o) Poverty and famines, Economic Development and Cultural Change, 32, pp. 881-886.
Sen, A.K. (1994p) Well-being, capability and public policy, Giornale Degli Economisti e Annali di Economica, 53(79), pp. 333-347.
Sen, A.K. (1994q) Why does poverty persist in rich countries?, in: P. Guidicini & G. Pieretti (Eds) Urban Poverty and Human Dignity (Milan, Franco Angeli), pp. 97-106.
Sen, A.K. (1995a) Agency and well-being: the development agenda, in: Heyzer et al. (Eds) A Commitment to the World's Women (New York, UNIFEM), pp. 103-112.
Sen, A.K. (1995b) Demography and welfare economics, Empirica, 22(1), pp. 1-21.
Sen, A.K. (1995c) Economic development and social change: India and China in comparative perspectives, Prospect.
Sen, A.K. (1995d) Economic regress: concepts and features, Proceedings of the World Bank Annual Conference on Development Economics, 1993 (Washington, D.C., World Bank), pp. 315-333.
Sen, A.K. (1995e) Environmental evaluation and social choice: contingent valuation and the market analogy, Japanese Economic Review, 46(1), pp. 23-37.
Sen, A.K. (1995f) Environmental values and economic reasoning, Nexus, 13, pp. [in Dutch].
Sen, A.K. (1995g) Gender inequality and theories of justice, in: M. Nussbaum & J. Glover (Eds) Women, Culture and Development (Oxford, Clarendon Press), pp. 259-273.
Sen, A.K. (1995h) How to judge voting schemes, Journal of Economic Perspectives, 9, pp. 91-98.
Sen, A.K. (1995i) Moral codes and economic success, in: S. Brittan & A. Hamlin (Eds) Market Capitalism and Moral Values (Aldershot, Edward Elgar), pp. 23-34.
Sen, A.K. (1995j) Nobody need starve, Granta.
Sen, A.K. (1995k) The political economy of targeting in: D. Vande Walle & K. Nead (Eds) Public Spending and the Poor: Theory and Evidence (Baltimore, Johns Hopkins University Press), pp. 11-24.
Sen, A.K. (1995l) Rationality and social choice, American Economic Review, 85, pp. 1-24.
Sen, A.K. (1995m) Varieties of deprivation: comments, in: E. Kuiper & J. Sap (Eds) Out of the Margin: feminist perspectives on economics (London & New York, Routledge), pp. 51-58.
Sen, A.K. (1995n) Word economy, Nieman Reports, 49(3), pp. 32-34.
Sen, A.K. (1996a) The concept of wealth, in: R.H. Mayers (Ed.) The Wealth of Nations in the Twentieth Century (Stanford, Hoover Institution Press), pp. 3-21.
Sen, A.K. (1996b) Economic interdependence and the world food summit, Development, 4, pp. 5-10.
Sen, A.K. (1996c) Employment, institutions and technology: some policy issues, International Labour Review, 135(3-4), pp. 445-471 [reprint of 1975 publication].
Sen, A.K. (1996d) Famine as alienation, in: State, Market and Development: essays in honour of Rehman Sobban (Dhaka: University Press Limited), pp. 15-32.
Sen, A.K. (1996e) Family fortunes of bronze age mint, Times Higher Education Supplement, 1230, pp. 20-25.
Sen, A.K. (1996f) Fertility and coercion, University of Chicago Law Review, 63(3), pp. 1035-1061.
Sen, A.K. (1996g) Freedom, capabilities and public action: a response, Notizie di Politeia 12(43-44), pp. 105-125.
Sen, A.K. (1996h) Freedom favors development, New Perspectives Quarterly, 13(4), pp. 23-27.
Sen, A.K. (1996i) Is the idea of purely internal consistency of choice bizarre?, in: J.E.J. Altham & T.R. Harrison (Eds) Language, World and Reality (Cambridge, Cambridge University Press), pp. 19-31.
Sen, A.K. (1996j) Legal rights and moral rights: old questions and new problems, Ratio Juris, 9, pp. 153-167.
Sen, A.K. (1996k) A matter of choice, UNESCO Courier, 49(8), pp. 10-13.
Sen. A.K. (1996l) On the status of equality, Political Theory, 24(3), pp. 394-400.
Sen, A.K. (1996m) On the foundations of welfare economics: utility, capability and practical reason, in: F. Farina, F. Hahn & S. Vannucci (Eds) Ethics Rationality and Economic Behaviour (Oxford, Clarendon Press).
Sen, A.K. (1996n) Our culture, their culture, New Republic, 214(14), pp. 27-34.
Sen, A.K. (1996o) Population policy: authoritarianism versus cooperation, Social Change.
Sen, A.K. (1996p) Rationality, joy and freedom, Critical Review, 10.
Sen, A.K. (1996q) Rights: formulation and consequences, Analyse and Kritik, 18, pp. 53-70.
Sen, A.K. (1996r) Secularism and its discontents, in: K. Basu & S. Subramamyam (Eds) Unraveling the Nation: sectarian conflict and India's secular identity (Penguin Books), pp. 11-43.
Sen, A.K. (1996s) Social commitment and democracy: the demands of equity and financial conservatism, in: P. Barker (Ed.) Living as Equals (Oxford, Oxford University Press), pp. 9-38.
Sen, A.K. (1996t) Social commitment and financial conservatism, Il Mulino, 364.
Sen, A.K. (1996u) Welfare economics and two approaches to rights, in: J.C. Pardo, & F. Schneider (Eds) Current Issues in Public Choice (Cheltenham, U.K. & Brookfield, VT, Edward Elgar), pp. 21-39.
Sen, A.K. (1997a) Economics, business principles and moral sentiments, Business Ethics Quarterly, 7, pp. 5-15.
Sen, A.K. (1997b) Editorial: human capital and human capability, Worm Development, 25(12), pp. 1959-1961.
Sen, A.K. (1997c) From income inequality to economic inequality, Southern Economic Journal, 64(2), pp. 384-401.
Sen, A.K. (1997d) Human rights and Asian values, New Republic, 217(2/3), pp. 33-40, 48.
Sen, A.K. (1997e) Indian traditions and the Western imagination, Daedalus, 126(2), pp. 1-26.
Sen, A.K. (1997f) Individual preference as the basis of social choice, in: K.J. Arrow, A.K. Sen, & K. Suzumura (Eds) Social Choice Re-examined, Vol. 2 (New York, St. Martin's Press), pp. 15-37.
Sen, A.K. (1997g) Inequality, unemployment and contemporary Europe, International Labour Review, 136(2), pp. 155-172.
Sen, A.K. (1997h) La liberta individuale come impegno sociale (Rome & Bari: Editori Laterza).
Sen, A.K. (1997i) Maximization and the act of choice, Econometrica, 65(4), pp. 745-779.
Sen, A.K. (1997j) On interpreting India's past, in: S. Bose & A. Jalal (Eds) Nationalism, Democracy and Development (New Delhi, Oxford University Press), pp. 10-35.
Sen, A.K. (1997k) Radical needs and moderate reforms, in J. Dreze & A.K. Sen (Eds) Indian Development: selected regional perspectives (Oxford & Delhi, Oxford University Press), pp. 1-32.
Sen, A.K. (1997l) The subject of human rights has ended up being a veritable battleground, Chronicle of Higher Education, 43(40), pp. B11-14.
Sen, A.K. (1997m) Tagore and his India, New York Review of Books, 44(11), pp. 55-63, 69.
Sen, A.K. (1997n) The vision that worked, Times Literary Supplement, 4923, pp. 3-4.
Sen, A.K. (1997o) What's the point of a development strategy?, in: E. Malinvaud et al. (Eds) Development Strategy and the Management of the Market Economy (Oxford, Clarendon Press), pp. 35-60.
Sen, A.K. (1998a) Human development and financial conservatism, World Development, 26, pp. 733-742.
Sen, A.K. (1998b) Morality as an indicator of economic success and failure, Economic Journal, 108(446), pp. 1-25.
Sen, A.K. (1998c) Universal truths, Harvard International Review, 20(3), pp. 40-43.
Sen, A.K. (1999a) Development as Freedom (New York, Knopf).
Sen, A.K. (1999b) Economics and the value of freedom, Civilization, 6(3), pp. 83-84.
Sen, A.K. (1999c) The possibility of social choice, American Economic Review, 89, pp. 349-878.